विश्व अंगदान दिवस...38 अपनों ने दी किडनी तो 55 लोग कर चुके देहदान
बरेली, अमृत विचार। अगर किसी जरूरतमंद को अस्पताल में भर्ती होने के दौरान एक यूनिट खून की आवश्यकता होती है तो उसके अपने ही सगे संबंधी रक्तदान करने से कतराते हैं, लेकिन ऐसे लोगों को उन लोगों से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने अंग दान कर मरीजों की जान बचाई है। अपने अजीज की जान बचाने के लिए 38 लोगों ने एक किडनी दान की है। यही नहीं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे छात्रों के प्रैक्टिकल के लिए 55 लोग अपनी देह तक दान कर चुके हैं।
एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में पहला किडनी ट्रांसप्लांट 30 मार्च 2022 को सफलतापूर्वक किया गया। इसके बाद से यहां अब तक 38 लोगों का गुर्दा प्रत्यारोपण किया जा चुका है। एसआरएमएस के किडनी विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार के अनुसार तकनीक के लगातार अपडेट होने के कारण मानव अंगों के प्रत्यारोपण की सफलता का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। शरीर का कोई अंग खराब होने के बाद भी मरीज में प्रत्यारोपण के जरिये जीवन के प्रति नई उम्मीद जगाई जा रही है।
दान में मिली देह से मानव शरीर की संरचना जान रहे मेडिकल छात्र
एसआरएमएस में अब तक 55 लोगों ने स्वयं संपर्क करके देहदान किया है। यहां पढ़ने वाले मेडिकल छात्र इनके मृत शरीर के जरिये मानव शरीर संरचना का ज्ञान हासिल कर रहे हैं। अब तक कॉलेज में पंजाब, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों के लोगों ने देहदान की है।
... ताकि मरने के बाद भी जिंदा रहें आंखें
एसआरएमएस मेडिकल कालेज के आप्थैल्मोलाजी विभाग की एचओडी डॉ. नीलिमा मेहरोत्रा के अनुसार दृष्टिहिनता कॉर्निया की बीमारी, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के बाद होने वाली दृष्टि हानि और अंधापन के प्रमुख कारणों में से एक है। ज़्यादातर मामलों में दृष्टि की हानि को ''नेत्रदान’ से ठीक किया जा सकता है। एसआरएमएस में वर्ष 2002 में आई बैंक की स्थापना हुई, अब तक 50 से 55 मरीजों का कार्निया ट्रांसप्लांट किया जा चुका है। नेत्रदान के लिए लगातार लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
क्यों जरूरी है किडनी ट्रांसप्लांट
एसआरएमएस के किडनी विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार के अनुसार खून से अपशिष्ट पदार्थों को छान कर मूत्र के जरिये शरीर से बाहर निकालने का काम किडनी करती हैं। यह बिना रुके लगातार काम करती रहती हैं। डायबिटीज, हाइपरटेंशन या किसी अन्य बीमारी के क्रोनिक स्टेज फाइव में पहुंचने पर किडनी काम करना बंद कर देती हैं। ऐसे में अपशिष्ट पदार्थों को खून से निकालने के लिए नियमित डायलिसिस शुरू हो जाती है। दोनों किडनी पूरी तरह खराब होने पर एक सप्ताह में तीन बार तक डायलिसिस आवश्यक है। डायलिसिस की जटिलताओं से बचने और जिंदगी को आसान बनाने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी होता है।
