सरकारी पदों को केवल संविदा या मृतक आश्रित नियुक्तियों से ना भरें, हाईकोर्ट ने नई नियुक्तियां करने का दिया निर्देश

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (यूपीएसआरटीसी) में मृतक कर्मचारियों के आश्रितों की नियुक्ति संबंधी कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अनुकम्पा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं बल्कि अपवाद है, जिसका उद्देश्य केवल आर्थिक संकट झेल रहे परिवार को राहत देना है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने निधि शर्मा व कई अन्य याचिकाओं को निस्तारित करते हुए पारित किया। 

याचियों का तर्क था कि निगम ने उनके आवेदन समय पर नहीं निपटाए और चयन सूची में उनके नाम शामिल नहीं किए। वहीं निगम ने कहा कि कई आवेदन मृतक कर्मचारी की मृत्यु के पाँच वर्ष बाद किए गए थे या उस समय आवेदक आवश्यक अर्हता पूरी नहीं कर रहे थे। कोर्ट ने माना कि याची यह साबित करने में असफल रहे कि नियुक्ति प्रक्रिया में कोई मनमानी हुई है या सीधी भर्ती न होने से उनका विधिक अधिकार प्रभावित हुआ है। 

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह याचिका जनहित याचिका के दायरे में भी नहीं आती। कोर्ट ने विशेष रूप से एक याचिका पर विचार करते हुए कहा कि कर्मचारी की मृत्यु 2006 में हुई थी, लेकिन आश्रित ने वयस्क होने के बाद छह वर्ष की देरी से आवेदन किया और चार वर्ष तक कोई कार्रवाई भी नहीं की। बाद में भेजा गया अनुस्मारक पत्र भी विलंबित था।

‘नियम, 1974’ के तहत पाँच वर्ष की समय-सीमा के बाद दिया गया आवेदन सामान्यतः मान्य नहीं होता और केवल अवयस्कता का आधार लेकर उसे समय पर दिया गया आवेदन नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि याची आवश्यक शर्तें पूरी नहीं करती थी, इसलिए उसका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि मृतक कर्मचारी की मृत्यु के पाँच वर्ष के भीतर ही आवेदन किया जाना अनिवार्य है। 

इस सीमा के बाद किया गया दावा मान्य नहीं होगा, साथ ही केवल मृतक आश्रितों को नियुक्त करना और सीधी भर्ती न करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ माना जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई कि वर्ष 2005 से चालक पदों पर और 2016 से परिचालक पदों पर सीधी भर्ती नहीं हुई। इसके स्थान पर नियुक्तियाँ या तो संविदा पर या कई वर्षों बाद एकमुश्त अनुकम्पा नियुक्ति के जरिए की जाती रही हैं। 

अतः कोर्ट ने यूपीएसआरटीसी को निर्देश दिया कि यदि चालक और परिचालक के पदों पर वास्तविक रिक्तियाँ हैं तो शीघ्र सीधी भर्ती की प्रक्रिया शुरू की जाए, साथ ही सरकार को आदेश दिया गया कि वर्ष 2003 के शासनादेश में यूपीएसआरटीसी के लिए दी जाने वाली अस्थायी शिथिलताओं पर स्थायी समाधान निकाला जाए ताकि हर वर्ष नियमानुसार अनुकम्पा नियुक्तियाँ हो सकें और एक साथ बड़ी संख्या में नियुक्तियों की स्थिति न बने। 

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने 2002, 2016 और 2018 में क्रमशः 650, 1200 और 587 मृतक आश्रितों की नियुक्तियाँ की थीं। इसी क्रम में अप्रैल 2025 के शासनादेश द्वारा 1165 पदों पर नियुक्तियों का रास्ता खोला गया। कोर्ट ने कहा कि इतने वर्षों तक अनुकम्पा नियुक्तियाँ न होने से लंबित मामलों की संख्या बढ़ना स्वाभाविक है, परंतु याची यह सिद्ध नहीं कर सके कि इस देरी के पीछे कोई अनुचित या पूर्वाग्रहपूर्ण कारण था, इसलिए जब तक नियुक्तियाँ ‘नियम, 1974’ के प्रावधानों के अनुरूप हैं, इतनी बड़ी संख्या में की गई नियुक्ति प्रक्रिया भी विधिसंगत मानी जाएगी।

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