आधुनिकता के दौर में भी कायम रायपुर मेले की पहचान, भारतीय संस्कृति और लोककलाओं से गहरा नाता
अयोध्या अमृत विचार: आधुनिकता के दौर में भी रायपुर मेले की पहचान कायम है। यह मेला इन दिनों शवाब पर है। लकड़ी सहित अन्य सामानों के लिए प्रांतीय स्तर पर प्रसिद्ध इस मेले का भारतीय संस्कृति और लोककलाओं से गहरा नाता रहा है। आज भी मेले में विविध रंग देखने को मिल रहे हैं। ऊपर से देखने पर यह मेला उपनगर जैसा दिखता है। शहर से लगभग 10 किमी. दूर अयोध्या-लखनऊ हाईवे पर अयोध्या की ओर से बाएं रायपुर गांव के पास बड़ी बाग में यह मेला चल रहा है। दुकानों की सजावट के लिए अलग-अलग प्रकृति के सामानों के हिसाब से जोन और सेक्टर बनाया गया है।
पैदल से वाहनों के आने-जाने के लिए मेले के बीच चौड़ी सड़के आकर्षण बढ़ाती हैं। यहां अनंत चतुर्दशी छह सितंबर पर भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप के पूजन-हवन के साथ मेला का शुभारंभ हुआ। हालांकि इसके दो दिन पूर्व ही मेले के प्रबंधक वीरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ बुढ़ऊ सिंह का निधन हो गया, लेकिन मेले की व्यवस्था देख रहे लोगों ने इस पर असर नहीं पड़ने दिया।
मेला लगभग डेढ़ महीने तक चलता है। मेले की पहचान लकड़ी के सामानों से खासतौर से है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से लकड़ी के सामान की दुकानें यहां डेढ़ महीने के लिए स्थायी होती है। छोटे से बड़ा कोई भी सामान सस्ता और टिकाऊ मिलता है। दुकानदार हरि प्रसाद बताते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था अच्छी है। लकड़ी के साथ खेती किसानी से जुड़े लोहे के सामान के साथ सौंदर्य प्रसाधन, खानपान और आधुनिक सामानों की स्थायी दुकानों के साथ विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। मेले में 24 घंटे की रौनक लोगों को आकर्षित कर रही है।
मेला प्रबंधन देख रहे जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन धर्मेंद्र प्रताप सिंह टिल्लू ने बताया कि लोगों में मेले के प्रति आकर्षण बढ़ा है। गांव देहात से शहर तक के लोगों के लिए सामानों की उपलब्धता से यह आकर्षण है। दुकानदार से आने वाले मेलार्थियों को कोई दिक्कत न हो, सुरक्षा की व्यवस्था की गई है।
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