सांझी: ब्रज की लोक चित्रांकन कला 

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Edited By Anjali Singh
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सांझी को ब्रज की लोक देवी माना गया है। यह ब्रज संस्कृति की उपासना का प्रमुख अंग है। ब्रज के अनेक देवालयों में इसे आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक अंकित किया जाता है। इसके मध्य में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित विभिन्न लीलाओं का भी अंकन किया जाता है। यह ब्रज की लोक चित्रांकन कला है। इसमें सूखे रंगों, फूलों व गोबर आदि के प्रयोग से अष्टकोणीय रूप में ज्यामितीय आकार की विभिन्न दृश्यावलियां फर्श, दीवार व कागज आदि पर बनाई जाती हैं। चूंकि सांझी का आशय संध्या से है, इसलिए इसके दर्शन सायं काल ही होते हैं। पितृ पक्ष में इनके बनाए जाने का प्रमुख कारण यह है कि एक तो इन दिनों यहां विभिन्न प्रकार के फूल सहजता से प्राप्त हो जाते हैं। अतएव यह कला ब्रज में पितृ पक्ष का विशेष उत्सव है। ब्रज के नगरीय क्षेत्रों में सूखे रंगों एवं ग्रामीण अंचलों में गोबर से इस कला का चित्रांकन बहुतायत से होता है। इसे तेल व जल के अंदर एवं तेल व जल के ऊपर भी एक विशेष तरीके से बनाया जाता है। फूलों से सांझी बनाए जाने का इतिहास 5000 हजार वर्षों से भी अधिक पुराना है।- डॉ. गोपाल चतुर्वेदी

सांझी बनाने की कला

सांझी बनाने हेतु सर्वप्रथम अष्टकमल आकर में पीली मिट्टी की वेदी बनाई जाती है। अष्टकमल अष्टसखियों का प्रतीक हैं। तत्पश्चात ज्यामिती आकार में डिजाइन डाली जाती है। इसमें सतिया-स्वस्तिवाचक के रूप में, सात बिंदी-सप्तऋषियों के प्रतीक के रूप में और केला रुद्र पूजा के रूप में अंकित किए जाते हैं। इसके बाद इन्स्टेंसिल लगाकर तरह-तरह के रंगों को डाली गई डिजाइनों के अंदर छाना जाता है। सबसे अंत में सांझी के मध्य ‘होंद’ बनाया जाता है, जिसमें रंगों के द्वारा भांति-भांति के दृश्य चित्रित कर उनके मध्य राधा-कृष्ण का युगल चित्र लगाया जाता है। चार पांच व्यक्ति दिनभर कठोर परिश्रम से कार्य करने के बाद सायं तक एक सांझी तैयार कर पाते हैं। 

Untitled design (12)

तत्पश्चात उसका ठाकुर जी के विग्रह की भांति अत्यंत विधि-विधान से भोग लगाया जाता है और उसकी आरती होती है। इसके बाद उसके दर्शन सभी के लिए खुलते हैं, जो कि रात्रि को मंदिर के पट बंद होने के तक खुले रहते हैं। प्रातः काल मंदिर की मंगला आरती के समय इसके दर्शन पुनः कराए जाते हैं। इसके बाद वेदी व राधा-कृष्ण की युगल छवि को छोड़कर पूरी सांझी बिगाड़ दी जाती है। अगले दिन कठिन परिश्रम के बाद विभिन्न दृश्यावलियों से सुसज्जित दूसरी सांझी बनाई जाती है। पितृ विसर्जन अमावस्या को प्रत्येक दिन की सांझी में प्रयुक्त होने वाले फूलों, रंगों आदि सामग्री को यमुना में विसर्जित कर दिया जाता है। ब्रज के ग्रामों में गोबर से भी सांझी बनाई जाती है।

कष्ट और श्रम साध्य कला

तत्पश्चात उन्हें फूलों व कौड़ियों आदि से सजाया जाता है। इस समय अधिकांशत: सूखे रंगों के द्वारा ही सांझी बनाई जाती है। ब्रज की अधिकांशत: कुंवारी कन्याएं श्रेष्ठ वर प्राप्त करने के उद्देश्य से भी सांझी बनाती हैं और व्रत भी रखती हैं। सांझी बनाया जाना अत्यंत कष्ट साध्य व श्रम साध्य कला है। क्योंकि इसे भक्ति भावना के साथ बनाया जाता है, इसलिए इसको जमीन पर बनाने वाले कलाकार इसे लकड़ी की तख्तियों पर बैठकर एवं घंटों झुके रहकर जमीन पर बिना पैर रखे बनाते हैं। वृंदावन के भट्ट जी मंदिर, राधावल्लभ मंदिर व राधारमण मंदिर आदि में पितृ पक्ष के दौरान अत्यंत चित्ताकर्षक व नयनाभिराम सांझी बनाई जाती है। वृंदावन के प्राचीन ब्रह्म कुंड पर पितृ पक्ष के पूरे 15 दिन सांझी का मेला लगता है। इसमें प्रतिदिन सांझी बनाने वाले कलाकार अपनी कला का हुनर दिखाते हैं। बाद को इन्हें पुरस्कृत भी किया जाता है। इस समय राधारमण मंदिर के सेवायत सुमित गोस्वामी एवं प्रियावल्लभ मंदिर के सेवायत रसिक वल्लभ नागार्च आदि की गिनती सांझी बनाने वाले प्रमुख कलाकारों में की जाती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार

पौराणिक कथाओं के अनुसार राधा रानी मानिनी देवी थीं, इसलिए श्रीकृष्ण ने प्रायः अपनी सभी लीलाएं राधा रानी को मनाने के लिए की थीं। परंतु राधा रानी ने श्रीकृष्ण को रिझाने के लिए कुछ ही लीलाएं की थीं, सांझी उन्हीं में से एक है। सांझी राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है। इसीलिए ब्रज में सांझी को राधा रानी का प्रतिरूप मानकर संध्या के समय उनकी उसी प्रकार पूजा-अर्चना की जाती है, जिस प्रकार ब्रज के मंदिरों में ठाकुर विग्रहों की पूजा-अर्चना होती है। सांझी कला राधा-कृष्ण के प्रेम की चरमतम अवस्था की परंपरा है, जो कि ब्रज में ही संजोयी गई है और विकसित हुई है। अष्टकोण में निहित होने एवं राधा रानी की कला होने के कारण इसे ‘वैष्णव यंत्र’ भी कहा गया है। सांझी कला ब्रज की लोक संस्कृति में निहित है। इसे प्रति वर्ष महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सांझी पर अनेक संतों,रसिकों व भक्तों आदि ने सैकड़ों पदों की रचना की है, जिनमें रसखान, सूरदास, हित हरिवंश महाप्रभु एवं भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि प्रमुख हैं।