आर्थिक बदहाली का शिकार हैं रेलवे की पहचान 'कुली'... बोले कर्मचारी- रेलवे की अनदेखी
लखनऊ/कानपुर। कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर लाल वर्दी और पीले बिल्ले में सजे कुली, जो कभी रेल यात्रियों की सुविधा का पर्याय हुआ करते थे, आज आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। पिछले दो दशकों में रेलगाड़ियों और यात्रियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन कुलियों की आय में लगातार कमी आई है। इस बदलते परिदृश्य में ट्रॉली बैग और इलेक्ट्रिक वाहनों ने उनकी रोजी-रोटी छीन ली है, जिससे उनके परिवार आर्थिक तंगी का शिकार हो गए हैं।
यात्री बढ़े, कुलियों की संख्या घटी
कानपुर सेंट्रल, जहां रोजाना सैकड़ों ट्रेनें आती-जाती हैं, देश के व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक है। दस प्लेटफार्मों वाले इस स्टेशन पर यात्री भार को कम करने के लिए कई ट्रेनों को गोविंदपुरी, अनवरगंज और पनकीधाम स्टेशनों पर स्थानांतरित किया गया है। एक अनुमान के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में इस स्टेशन पर यात्री संख्या में 40% की वृद्धि हुई है, जबकि कुलियों की संख्या 2008 की तुलना में लगभग 35% कम हो गई है। उनकी आय में 70% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण यात्रियों का ट्रॉली बैग का उपयोग और स्टेशन पर उपलब्ध इलेक्ट्रिक कार्ट हैं, जो सामान ढोने का काम कर रहे हैं।
कुलियों की व्यथा: मेहनत का नहीं मिलता मोल
वर्तमान में कानपुर सेंट्रल पर 247 कुली कार्यरत हैं, जो दिन-रात यात्रियों की सेवा में तत्पर रहते हैं। ट्रेन के आते ही वे स्लीपर और एसी कोच के सामने सामान ढोने की उम्मीद में खड़े हो जाते हैं, लेकिन ज्यादातर समय उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। यात्री अपने ट्रॉली बैग खुद खींच लेते हैं, जबकि भारी सामान के लिए इलेक्ट्रिक कार्ट उपलब्ध हैं, जो मूल रूप से बुजुर्ग और दिव्यांग यात्रियों के लिए हैं, लेकिन स्टेशन प्रशासन की मिलीभगत से सामान ढुलाई में उपयोग हो रहे हैं।
कुली विजय सिंह ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया, "2000 में जब मुझे पिताजी का बिल्ला मिला था, तब रोजाना 400-500 रुपये की कमाई हो जाती थी। अब 25 साल बाद यह घटकर 100-150 रुपये रह गई है। कई बार तो एक भी यात्री का सामान ढोने का मौका नहीं मिलता। मेरे परिवार में पत्नी, माता-पिता और दो छोटे बच्चे हैं, जिनका पालन-पोषण मुश्किल हो रहा है।"
शेर सिंह ने बताया कि 2008 में स्टेशन पर 402 कुली थे, जिनमें से 225 को रेलवे ने गैंगमैन की नौकरी दी थी। इसके बाद कुलियों की संख्या घटकर 200 के आसपास रह गई, और अब 247 हैं। लेकिन कई कुली अब प्लेटफार्म पर आना ही छोड़ चुके हैं, क्योंकि दिनभर दौड़ने के बाद भी निराशा ही मिलती है।
रेलवे से गुहार: सम्मानजनक जीवन की मांग
विजय और शेर सिंह ने रेलवे प्रशासन से गुहार लगाई कि उनकी आजीविका पर ध्यान दिया जाए। विजय ने कहा, "हम दशकों से रेलवे के परिवार का हिस्सा हैं और पूरी मेहनत से यात्रियों की सेवा करते हैं। रेलवे को हमें समायोजित करने में दिक्कत है तो कम से कम न्यूनतम मानदेय तय कर दे, ताकि हमारा परिवार सम्मानजनक जीवन जी सके।"
दोनों कुलियों ने भावुक होकर कहा कि वे अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं लाएंगे। "हम कर्ज में डूबे हैं, अपमान सहना पड़ता है। हमारे बाप-दादाओं का यह पेशा था, लेकिन हमने नहीं सोचा था कि हमें यह दिन देखना पड़ेगा।"
कानपुर सेंट्रल के कुली रेलवे की अनदेखी और आधुनिक तकनीक के दबाव में अपनी पहचान और आजीविका खो रहे हैं। रेलवे प्रशासन को उनकी स्थिति पर विचार कर उनके लिए वैकल्पिक रोजगार या न्यूनतम आय सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए, ताकि ये मेहनती लोग सम्मान के साथ जी सकें।
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