सजाए गए मंदिर, पधार रहीं जगदंबा भवानी... शारदीय नवरात्र आज से, मंदिरों के बाहर दुकानें सजीं, सुरक्षा के भी इंतजाम
लखनऊ, अमृत विचारः नवरात्र की शुरुआत सोमवार से हो गई है। प्रमुख देवी मंदिरों में सजावट के साथ सभी तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। कालीजी चौक, कालीबाड़ी, संदोहन माता मंदिर, दुर्गा मंदिर शास्त्रीनगर, चंद्रिकादेवी मंदिर कठवारा समेत प्रमुख मंदिरों में प्रात काल से ही भक्तों की कतारें लगने लगेंगी। सुरक्षा व्यवस्था के भी चाक-चौबंद इंतजाम किए गए हैं।
महिलाओं में दिखा खरीदारी का उत्साह
नवरात्र को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। माता दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना के लिए घर-घर में तैयारी की गई। महिलाओं ने पूजा के लिए धूपबत्ती, कपूर, घी, लौंग, हवन सामग्री, नारियल, कलश, आम के पत्ते, माता की चुनरी, चुनिंदा वस्त्र, चूड़ियां और फूलमालाओं की खरीदारी की। पूजा सामग्री की दुकानों पर दिनभर भीड़ लगी रही।
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फल और फूलों के बढ़े दाम
नवरात्र शुरू होते ही फलों और फूलों के दामों में वृद्धि देखी गई। सामान्य दिनों की तुलना में सेब 100 रुपये किलो से बढ़कर 120 रुपये किलो, जबकि केला 50 रुपये दर्जन से 70 रुपये दर्जन में बिक रहा है। फल विक्रेताओं का कहना है कि नवरात्र में मांग बढ़ने के कारण कीमतों में यह बढ़ोतरी सामान्य है। फूल मंडी में भी गेंदा फूल की मांग सबसे अधिक रही, जो 200 रुपये किलो तक पहुंच गया। जबकि दो दिन पहले इसकी कीमत 170 रुपये किलो थी। दुकानदारों के अनुसार नवरात्र के दौरान मंदिरों, पंडालों और घरों में सजावट के लिए गेंदा फूल की अधिक मांग रहती है। गुलाब और कमल जैसे फूलों की मांग तुलनात्मक रूप से कम रही। श्रद्धा और आस्था से परिपूर्ण इस पर्व को लेकर लोगों में भारी उत्साह है और पूरे वातावरण में भक्ति और उल्लास का माहौल दिखाई दे रहा है।
घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि प्रातःकाल सूर्योदय के समय द्विस्वभाव लग्न कन्या रहेगी, जो कि घट स्थापना व दुर्गा पूजन के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। मध्याह्न में अभिजित् मुहूर्त में भी घटस्थापना किए जाने का विधान है। सोमवार को घट स्थापना मुहूर्त प्रात: 06:09 से प्रात: 08:06 व मध्याह्न में अभिजित् मुहूर्त दिन में 11:49 से 12:38 श्रेष्ठ है।
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पहले दिन मां शैलपुत्री का पूजन
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। शैलीपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। इसी वजह से मां के इस स्वरूप को शैलपुत्री कहा जाता है। इनकी आराधना से हम सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं।
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पूजा विधि
सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर केशर से ''शं'' लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। मां शैलपुत्री का प्रसन्न करने के लिए यह ध्यान मंत्र जपना चाहिए। इसके प्रभाव से माता जल्दी ही प्रसन्न होती हैं और भक्त की सभी कामनाएं पूर्ण करती हैं।
मंत्र इस प्रकार है-
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:। मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका व मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जप कम से कम 108 करे। मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें।
ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिये
मां शैलपुत्री के मुख्य मंत्र हैं "ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥", "वंदे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥", और "या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥" इन मंत्रों के जाप से जीवन में स्थिरता आती है और चंद्रमा से संबंधित दोष दूर होते हैं।
मां शैलपुत्री के कुछ प्रमुख मंत्र:
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
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यह एक बीज मंत्र है जिसका जाप नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा में किया जाता है।
वंदे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
यह स्तुति मंत्र है, जो मां शैलपुत्री की महिमा का वर्णन करता है।
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
यह बीज मंत्र भी है, जो देवी के सभी रूपों में निवास करने का भाव व्यक्त करता है।
मंत्रों के लाभ:
मां शैलपुत्री के मंत्रों के जाप से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है। चंद्रमा से संबंधित दोष दूर होते हैं। कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भक्त सुख-सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
