लोकरंग की बहुआयामी सौगात: गवरी
अरावली की घाटियों में बसे राजस्थान के ‘भील’ वनवासियों का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। एकलव्य की संतान माने जाने वाले ये भील महाराणा प्रताप की गोरिल्ला फौज के बहादुर सैनिक थे। मेवाड़ राजवंश के राज-चिन्ह में भील को ‘भीलू राणा’ के रूप में तीर-कमान लिए रक्षक के रूप में दिखाया गया है। अपने अंगूठे के रक्त से नए महाराजाओं के राजतिलक का विशेषाधिकार तक मिला हुआ था इन्हें। राजस्थान के इन्हीं भीलों का परंपरागत लोकनाट्य है
गवरी'। गवरी को लोकमानस में ‘राई’ के नाम से भी जाना-पहचाना जाता है। शिव और भस्मासुर की कहानी गवरी की मूल कथा मानी जाती है। गवरी में जो दृश्य अभिनित किए जाते हैं वे खेल, भाव अथवा सांग के नाम से पुकारे जाते हैं। गवरी के मूल में नृत्य की प्रधानता रही है, जो आज भी देखी जा सकती है। प्रत्येक भील परिवार का सदस्य इसमें भाग लेना अपना नैतिक व धार्मिक कर्तव्य समझता है। फलतः गवरी में कलाकारों की संख्या चालीस-पचास से लगाकर सौ से भी ज्यादा तक हो जाती है।
मुहूर्त के अनुसार प्रायः रक्षाबंधन के बाद आने वाली ठंडी राखी के दिन से ही गवरी प्रारंभ हो जाती है जो लगभग 40 दिनों तक अनवरत चलती है। प्रत्येक भीली गांव में इस समय गवरी नाचना अनिवार्य-सा है। जिस गांव में गवरी नहीं ली जाती वहां वर्षा कम ज्यादा होने, अकाल पड़ने, भयंकर भूकंप आने, आग लग जाने, चोरी-डाका पड़ने एवं हरी-भरी खेती नष्ट हो जाने की आशंका रहती है। ऐसी भील समुदाय की मान्यता है। भारत में कहीं भी ऐसा लोकनाट्य नहीं मिलेगा, जो इतनी लंबी अवधी तक पात्रों के इतने बड़े समूह के साथ विविध गांवों में इतने सुव्यवस्थित ढंग से सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रदर्शित किया जाता है।
इस नृत्य नाटिका में प्रमुख नायक बूड़िया है, जिसे शिव का प्रतिक माना जाता है। इसके बदन पर भगवा साफा बंधा होता है। कमर में बड़े-बड़े घुंघरू बंधे रहते हैं। बूड़िया अपने मुंह पर भयानक मुखौटा बांधे रहता है। इसके हाथ में लकड़ी की बनी तलवार होती है। यह प्रत्येक स्वांग के पहले और अंत में दूसरे कलाकारों के विपरीत दिशा में नृत्य करता है। बूड़िये के साथ दो ‘रायां’ होती है, जिनमें अलौकिक शक्तियों का प्रवेश रहता है। वे मुंह को इस प्रकार बांधे रहती है कि केवल आंखें ही दिखाई पड़ती हैं। दो भोपे होते हैं, जिनके गले में देवताओं के प्रतीक चिन्ह बंधे रहते हैं। ये हाथ में मोर-पंख, लोह-जंजीर आदि रखकर देवताओं से नृत्य परिसर में उपस्थित रहने के लिए प्रार्थना करते हैं।
गांव का कोई मैदान, चौराया अथवा खुला आंगन ही गवरी का रंगमंच होता है। जहां-जहां गवरी वाले गांव की बहिन-बेटियां ब्याही हुई होती हैं, वहां-वहां इसके प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। गवरी में चार प्रकार के पात्र होते हैं, जिनमें देवपात्र, मानव पात्र, दानव पात्र एवं पशु पात्र होते हैं। देवपात्र सभी प्रकार के विकारों से रहित आदर्श के प्रतीक एवं कालजयी होते हैं। कालका, शिव- पार्वती देव पात्र के रूप में उपस्थित होते हैं। गवरी में मानव पात्रों की बहुलता होती है, जिनमें कंजर, नट, भोपा, संकरिया, बूड़िया, खेतूड़ी, देवर, भोजाई, बादशाह, बणियां, कानुगुजरी, कृष्ण आदि होते हैं। डाकण, भंवरा, हठिया, भियांवड़ तथा खड़ल्या भूत गवरी के दानव-पात्र हैं, इनका रूप भयानक होता है। सूअर, रीछ तथा शेर पशु पात्र होते हैं। गवरी में कभी पुरुष पात्र अपना शौर्य दिखाते हैं तो कभी अशुद्ध एवं असत् वृत्तियों के दानव पात्र सृष्टि को अपने मनोनुकूल संचालित करने का प्रयत्न करने हैं एवं सृष्टि पर कब्जा करना चाहते हैं। गवरी में ये पात्र धाड़-फाड़ करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन अंत में कालचक्र ऐसा आता है कि सभी नष्ट हो जाते हैं और देवसत्ता स्थापित हो जाती है।
गवरी धारण के पीछे मात्र मनोरंजन का उद्देश्य ही नहीं रहा और न ही आजीविका उपार्जन की भावना ही दृष्टिगोचर होती है। इसका मुख्य उद्देश्य भीलों द्वारा अपने धार्मिक कर्तव्य की संपूर्ति तथा बाबा शिव को रिझाकर गांव की खुशहाली, जाति की सुरक्षा एवम् रोग-शोक, दुःख-दारिद्र तथा दुर्भिक्ष से छुटकारा पाने का रहा है।
गवरी में नृत्य की भी प्रधानता पाई जाती है। पात्रों में होने वाले संवाद बड़े नाटकीय एवं मनोरंजक होते हैं। नृत्य के अलावा इसका गीत पक्ष भी बड़ा प्रबल होता है। कलाकारों की पोशाकें बड़ी कलात्मक सज्जा लिए पात्रों की भूमिका के अनुरूप होती है। इन्हें धारण कर पात्र अपने को साधारण व्यक्ति से अलग अनुभव करता है और सफलता के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह करता है। गवरी में स्त्रियों की भूमिका भी पुरुष ही अदा करते हैं। यह सच है कि लोककलाएं प्रदर्शन के बिना जिंदा नहीं रह सकती और प्रदर्शन से उनकी कलाएं संवरती-निखरती हैं, लेकिन इन कलाओं को सीख-समझकर उन्हें सरंक्षण देने वालों को सरंक्षण कहा है? हमें स्वयं व आने वाली पीढ़ी को लोक कलाओं से जोड़कर हर संभव हमारी महान विरासत को संरक्षित करना होगा। सरकारी स्तर पर भी इस दिशा में व्यापक प्रयास होने चाहिए। लेख ● राजकुमार जैन राजन
