यात्रा वृतांत: स्वर्ग के करीब की एक जगह : त्रियुंड

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Edited By Anjali Singh
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दूर किसी मैदानी शहर से किसी पहाड़ी शहर तक आना, आरामदायक होटल में रुकना, कुछ खास जगहों को देखना और फिर वापस लौट जाना। हम में से अधिकतर लोगों का घूमने का प्लान यही होता है, लेकिन कुछ हम जैसे भी होते हैं, जिनके लिए घूमने का मतलब है हर पल को जीना, उस जगह के जर्रे-जर्रे को महसूस करना और एडवेंचर ही जिंदगी है। आप भी एडवेंचर के शौकीन हैं और प्रकृति को करीब से महसूस करना चाहते हैं तो बस बैग पैक करिए और निकल पड़िए त्रियुंड ट्रैकिंग के लिए।

मार्च से जून और सितंबर से नवंबर तक त्रियुंड यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय है। मैं अपने मित्र के साथ जब हिमाचल के खूबसूरत शहर मैक्लोडगंज पहुंचा तो चारों तरफ मनमोहक नजारे थे। आप इस यात्रा में मैक्लोडगंज को बेस कैंप की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। हमने शाम को वहीं एक ट्रैवल एजेंट से त्रियुंड में रहने के लिए टेंट बुक कर लिया। टेंट का किराया एक हजार रुपये प्रति व्यक्ति था, जिसमें रात का खाना और सुबह का नाश्ता भी शामिल था। मैक्लोडगंज से करीब चार किलोमीटर ऊपर है गोलू मंदिर यानी वो जगह, जहां से कोई वाहन आगे नहीं जा सकता। त्रियुंड की असली यात्रा यहीं से शुरू होती है। यहीं पुलिस का एक पिकेट है, जहां ऊपर चढ़ने से पहले आपको रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। यह औपचारिकता पूरी करके हमने त्रियुंड की तरफ कदम बढ़ाए। 

घड़ी बता रही थी कि दोपहर के ग्यारह बजने वाले हैं। सामने था पथरीला और जोखिम भरा रास्ता न कोई सड़क, बस दोनों तरफ पेड़ों से ढकी पगडंडी। शुरुआत में भरपूर जोश था इसलिए कदम तेजी से चल रहे थे, लेकिन कुछ ही मिनटों में हकीकत समझ आ गई। तेज धूप, बिना अभ्यास की चढ़ाई और तेज रफ्तार का असर। नतीजा, हमें पांच मिनट में ही पहला स्टॉप लेना पड़ा। फिर तय किया कि अब धीरे-धीरे चलेंगे। करीब एक घंटे बाद लगा जैसे पहाड़ ने हमसे दोस्ती कर ली हो। तेज धूप ठंडी हवा में बदल गई। नीचे मठों से आती घंटियों की आवाज एक प्यारी धुन-सी बन गई। हमारा बदन अब हमारे इरादों का साथ देने लगा। धीरे-धीरे प्रकृति का घूंघट उठने लगा और हम महसूस करने लगे एक नई और अनदेखी दुनिया को।

कहीं रास्ते का नामोनिशान नहीं था तो कहीं चट्टानों के बीच से राह खोजनी पड़ी। कहीं जंगली फूलों की खुशबू हमें अपनी ओर बुला रही थी तो कहीं डरावनी खाई थी। हरे-भरे मैदान मिले तो कुछ सहमी-सफेद भेड़ें हमारा स्वागत करती दिखीं। कभी सहयात्रियों का कोई झुंड दोस्त बन रहा था। इस बीच हम पहुंच गए “मैजिक व्यू कैफे”  त्रियुंड ट्रैक का एक अहम पड़ाव।

थोड़ा आगे बढ़ते ही मौसम खुशगवार हो गया, लेकिन कुछ कदमों बाद बारिश ने हमें तरबतर कर दिया। ठंड काफी बढ़ गई थी। अब मुझे अपनी ऊनी टी-शर्ट का महत्व समझ आने लगा। कुछ दूरी पर आसमान से ओले गिरने लगे। हाथ-पांव ठंड से कांप रहे थे। तभी एक छोटी-सी दुकान दिखी और हम वहां जाकर छिप गए। त्रियुंड का अंतिम एक किलोमीटर ट्रैकिंग सबसे थकाने वाला है। इसमें करीब 22 खतरनाक मोड़ हैं। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ऑक्सीजन भी कम होने लगती है, जिससे सांसें तेजी से फूलने लगती हैं। मैंने अपनी बोतल में बचे पानी का आखिरी घूंट पिया और साथी का हाथ पकड़कर सामने की चट्टान पार की। हमारे सामने हरा-भरा मैदान था, जो जैसे हमारा स्वागत कर रहा हो। यही तो हमारी मंजिल थी, हम त्रियुंड पहुंच चुके थे।

इस पड़ाव को पार करने के बाद जो दृश्य सामने था, वो बेमिसाल था। हमारे सामने फैला था बड़ा मैदान, जिस पर मानो हरी घास की कालीन बिछी हो। यहां-वहां रंग-बिरंगे टेंट चमक रहे थे। सामने खड़ा था धवल सफेद बर्फ से ढका हिमालय (धौलाधार पर्वत श्रृंखला)। हमारी सारी थकान न जाने कहां गुम हो गई थी। मैं अपनी जिंदगी की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक का दीदार कर रहा था। जल्द ही हमने अपने लिए एक टेंट लगवा लिया। मैदान के अंतिम छोर पर, ताकि हिमालय का दृश्य बिना किसी रुकावट के सामने हो। टेंट छोटा था, लेकिन काम चल सकता था। कभी चारागाह रहा त्रियुंड अब बेहद रौनक से भरा था। सूरज ढलने ही वाला था और मौसम में काफी ठंडक थी। कई एकड़ में फैले मैदान में हर तरफ बस और बस प्रकृति थी।

मैदान के अंतिम सिरे पर पड़ी एक शिला पर बैठकर मैं विराट हिमालय को निहार रहा था। ठंडी घास पर रखे मेरे पैर जैसे हिमालय को छूने को मचल रहे थे। धीरे-धीरे हिमालय सूरज को अपनी गोद में ले रहा था और कुछ देर के लिए सफेद हिमालय के रंग बदलते रहे। सचमुच यह अद्भुत नज़ारा था। इतना कि मुझे तस्वीर लेना भी याद नहीं रहा। यह वो खूबसूरती थी, जिसके बारे में शायद ही आपने कभी कल्पना की हो। हल्की-हल्की ठंडी हवा बालों और चेहरे को जैसे किसी अपने की तरह सहला रही थी। मुझे लग रहा था कुछ जगहें देखने से ज्यादा महसूस करने के लिए होती हैं, जैसे त्रियुंड।

शाम के सात बज चुके थे। त्रियुंड में घिरते अंधेरे ने रात होने की दस्तक दी। दुनियादारी से परे एक खामोश और सुनहरी-सी रात थी। यहां की कुछ दुकानों में लालटेनें जल रही थीं या कहीं-कहीं टेंट में हल्की-सी टॉर्च की रोशनी थी बस। अंधेरा गहरा चुका था। जल्द ही अलग-अलग देशों और कोनों से आए लोग दोस्त बन गए। हमने साथ में ही डिनर किया। भूख इतनी ज्यादा थी कि उस वक्त मिला दाल-चावल-राजमा बेहद स्वादिष्ट लगा। थोड़ी देर बाद हम अपने कैंप की तरफ लौट आए। 

मैं सुबह साढ़े चार बजे ही टेंट से बाहर निकल आया। एक मासूम सी सुबह हमारा स्वागत कर रही थी। सूरज धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था। चारों तरफ खामोशी थी। बर्फीले बादल पास से गुजर रहे थे। ठंड और बढ़ गई थी। शायद मैं उस मैदान में पहला इंसान था जो उस समय टेंट से बाहर खड़ा था। मैं उस पल के हर लम्हे को अपने अंदर समेट लेना चाहता था। दिल कह रहा था- काश, वक्त थोड़ा और रुक जाए, लेकिन ‘काश’ हमेशा एक खतरनाक शब्द होता है। वापस लौटते समय मेरे पास थे, उस खूबसूरत जगह पर बिताए गए शानदार पल।लेखक- साहित्यकार मृदुल कपिल