कठपुतली लोक कला का जीवंत रूप
भारत देश में लोक गीत, संगीत, नृत्य, परंपराएं और कलाएं आदि केवल प्रदर्शन या मनोरंजन का साधन नहीं है, वास्तव में ये समाज को सुगठित रूप से संचालित करने का सूत्र है। विभिन्न बोलियों, भाषाओं, अंचलों, संस्कारों वाले विविधता भरे हमारे देश में लोक कलाएं, परंपराएं मानव सभ्यता के विकास की सहयात्री रही हैं। आधुनिक शिक्षा के प्रसार में पारंपरिक लोक परंपराएं, कलाएं लुप्त होती जा रही हैं, उन्हें अपने अस्तित्व और अपने पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने के संकट से जूझना पड़ रहा है। लोक कलाओं की विविध विधाओं से समाज को, विशेषकर नई पीढ़ी को परिचित कराना आवश्यक है।
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हम जब छोटे बच्चे थे, हमारे आसपास कोई भी मेला, धार्मिक त्योहार या सामाजिक आयोजन कठपुतली नाच के बिना अधूरा होता था। भारत में पारंपरिक कठपुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोक कथाएं और किंवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कठपुतली राजस्थान की प्राचीन लोक कला है। राजस्थान की यह लोक कला भारत और पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। कठपुतली लोक कला भट आदिवासी जाति के लोगों का पारंपरिक व्यवसाय भी है। कठपुतलियों को तार अथवा धागे के माध्यम से अंगुलियों द्वारा नचाया जाता है।
कठपुतली विश्व के प्राचीनतम रंगमंच पर खेले जाने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों में से एक है। कठपुतलियों को विभिन्न प्रकार के पुरुष, पशु, देव, असुर पात्रों के रूप में बनाया जाता है। इनका नाम कठपुतली इस कारण पड़ा, क्योंकि इनको लकड़ी अर्थात काष्ट से बनाया जाता था। कठपुतली के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में महाकवि पाणिनी की ‘अष्टाध्याई’ ग्रंथ में हमें ‘पुतला नाटक’ का उल्लेख मिलता है। इसके जन्म को लेकर कुछ पौराणिक मत इस प्रकार मिलते हैं कि भगवान शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर, माता पार्वती का मन बहलाकर इस कला को प्रारंभ किया था। इसी प्रकार उज्जैन नगरी के राजा विक्रमादित्य के सिंहासन में जड़ित 32 पुतलियों का उल्लेख ‘सिंहासन बत्तीसी’ नामक कथा में भी मिलता है।
भारत सहित एशियाई देशों में कठपुतली नाट्य सदियों से लोकानुरंजन और शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। भारत से लेकर पूर्वी एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा इत्यादि में विस्तार हुआ। आधुनिक युग में यह कला रूस, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया, जर्मनी, जापान, अमेरिका, चीन आदि देशों में विस्तारित हो चुकी है। अब कठपुतली का उपयोग मात्र मनोरंजन न रहकर शिक्षा कार्यक्रमों, विज्ञापनों आदि अनेक क्षेत्रों में किया जा रहा है।
हमारी विविधरंगी लोक संस्कृति, परंपरा, कलाओं की परंपरा में कठपुतली नृत्य का विशेष महत्व है। आज साइबर दुनिया में वैश्वीकरण की आपाधापी में हमारी आने वाली भावी पीढ़ी को हमारी इस स्वर्णिम विरासत से परिचित कराना बेहद आवश्यक हो गया है। हमारी लोकजीवन, संस्कृति, कला, परंपरा आदि का प्रत्येक पक्ष इतना प्रबल व सशक्त है कि संवेदनहीन व्यक्ति भी संवेदना के तीव्र उद्वेग को उत्पन्न कर सकता है। भारतीय कला और कलाकृतियां व्यक्ति की आत्मा को झंझोड़ने की क्षमता रखती है।
उदयपुर शहर में विश्व विख्यात ‘भारतीय लोक कला मण्डल’ में इसकी स्थापना के साथ ही कठपुतली कला को विश्वव्यापी बनाने के स्तुत्य प्रयास किए हैं। कई कलाकारों को कठपुतली प्रदर्शन का प्रशिक्षण विश्व स्तर पर यहां प्राप्त हुआ है। भारतीय संस्कृति, चिंतनपरंपरा, धर्म, अध्यात्म और दर्शन के मिश्रण ने कठपुतली कला को संप्रेक्षणीय बनाया है। यह सच है कि भारतीय कला परंपराओं का संरक्षण उनके लगातार प्रदर्शन से ही संभव हो सकता है। देश में साक्षरता अभियान, बाल-विवाह, स्वच्छ भारत मिशन अभियान, मतदान के लिए जागरुकता अभियान जैसे आमजन को उनकी अपनी संस्कृति की भाषा में जागरूक करने के लिए कठपुतलियां माहौल को जीवंत कर देती हैं।
कला का क्षेत्र आज बहुत व्यापक हो गया है, इसमें निरंतर नई दृष्टि से कलाओं के नवीन स्वरूप का सृजन हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों से राज्य में परंपरागत रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के खेलों में काफी परिवर्तन हो गया है। अब यह खेल गांवों, मोहल्लों, सड़कों, गलियों में न होकर थियेटरों, बड़े-बड़े मुक्ताकाशी रंगमंचों व सितारा होटलों में होने लगा है। इसके बावजूद राजकीय संरक्षण व पोषण के अभाव में इस लोक-कला के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब गांव-मोहल्लों में कहीं कठपुतली का खेल नजर नहीं आता। कठपुतलियां केवल सजावटी वस्तु के रूप में ही खरीदी जा रही हैं। कठपुतली कला के संरक्षण-संवर्धन के लिए व्यापक प्रयत्नों की दरकार है। नए आयाम, नए प्रतिमान, नए मायने और नई तकनीकों की खोजकर कठपुतली कला और कलाकारों को राज्याश्रय मिलना ही चाहिए। - राजकुमार जैन राजन
