ताने-बाने में बसी कला और संस्कृति

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Edited By Anjali Singh
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सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जनपद अमरोहा उत्तर प्रदेश का एक ऐसा नगर है, जो भौगोलिक नक़्शे पर भले ही बहुत बड़ा नहीं है। परंतु इसकी स्मृतियों, साहित्यिक व सांस्कृतिक धरोहरों की गहराइयां इतनी विराट हैं कि वहां से निकले लोग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, सिनेमा और भावनात्मक चेतना में अपना चिरस्थायी स्थान रखते हैं। यहां की मिट्टी में शब्द, राग और रूहानियत का गहरा रंग घुला है। अमरोहा में जन्मे लेखक, फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही और उनकी शरीके हयात ‘ट्रेजेडी क्वीन’ अभिनेत्री मीना कुमारी से पूरा संसार परिचित है। उर्दू अदब में सबसे चर्चित और पसंद किए जाने वाली एक शख्सियत जॉन एलिया का जन्मस्थान भी अमरोहा है। उनके कलाम से नई पीढ़ी आज भी उतना ही प्रभावित है, जितना उनके दौर में लोग उन्हें पसंद करते थे।--- डॉ. पारुल तोमर

अमरोहा की गलियां उर्दू तहजीब का खजाना हैं, जहां अब भी पुरानी हवेलियों , इत्र, कागज और किताबों की दुकानों से अदब की खुशबू आती है। इसी अमरोहा जनपद के नौगावां सादात क्षेत्र के एक छोटे से गांव मखदूमपुर के हथकरघों में बुना हर धागा जैसे अपनी एक अलग यात्रा पर निकल पड़ा है। इसकी संकरी गलियों में सुबह की किरणें जैसे ही उतरती हैं, हथकरघों की खट-खट वातावरण में गूंजने लगती है। यह आवाज सिर्फ कपड़ा बुनने की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक सांस्कृतिक धड़कन की आवाज है। यहां के बुनकर, जिनकी उंगलियां धागों को मानो सांस लेने की लय देती हैं। ये कपास, रेशम और जरी के तानों-बानों में पूरे अमरोहा की पहचान बुनते हैं। 

बुनकरों के हाथों में बारीकी और डिजाइन का अद्भुत संगम है। ये रंग-बिरंगे गलीचे, चादर आदि को इस तरह कुशलता से बुनते हैं, जैसे कोई चित्रकार अपने कैनवास पर रंग भर रहा हो। फूल-पत्तियों के पैटर्न, ज्यामितीय आकृतियां और पारंपरिक नक़्शे इनको अद्वितीय पहचान देते हैं, जो कभी गांव की चौपाल और घर आंगन में बिछी चारपाई का हिस्सा बनते हैं, तो कभी हजारों मील दूर विदेश के किसी आलीशान ड्राइंग रूम के फर्श की शान बढ़ाते है। आज देश-विदेश में अमरोहवी गलीचे, चादरें, दोहरें, कुशन आदि घर-घर की पसंद बन चुके हैं।

7 अगस्त 1905 को जब स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई, तब देशवासियों ने विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर हथकरघा उद्योग को पुनः जीवन देना शुरू किया। यह एक सांस्कृतिक और आर्थिक विद्रोह था, जिसमें करघे पर बनी खादी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक बन गई थी। हथकरघा उद्योग महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता का माध्यम बनकर उभरा है। गांवों की असंख्य महिलाएं, जो कभी घर की देहरी तक सीमित थीं, आज हथकरघे के माध्यम से आर्थिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ रही हैं। वे घर पर रहकर ही अपनी कला से रोजगार कमा रही हैं, बच्चों को पढ़ा रही हैं, परिवार चला रही हैं।