कानपुर : जीएसवीएम के 1971 बैच के डॉक्टरों ने अपनी यादों को संजोया
बैच ने छह लाख रुपये जीएसवीएम को एफडी के तौर पर जेएम को दिया
कानपुर, अमृत विचार। डॉक्टरों को मरीजों के साथ सेवा भाव से न सिर्फ पेश आना चाहिए, बल्कि मरीज को अपने परिवार का सदस्य समझकर ही उसका इलाज करना चाहिए। उसकी तकलीफ समझना चाहिए और मुस्कुराकर अच्छे से व्यवहार करना है, ऐसा करने से मरीज की 10 से 20 फीसदी परेशानी हल होती है।
गलत तरह से पेश नहीं आना चाहिए। बीमारियों के निदान के लिए शोध कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए। यह जानकारी शनिवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की पूर्व प्राचार्य डॉ.आरती लाल चंदानी ने एक कार्यक्रम के दौरान दी।

बिठूर स्थित होटल गंगा वैली में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के 1971 बैच रियूनियन का तीन दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसके दूसरे दिन शनिवार को बैच के सदस्य जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज पहुंचे, यहां परिसर में एकत्र होकर उन्होंने अपनी पुरानी यादें ताजा की और एलटी हाल में लेक्चर के दौरान एक दूसरे के साथ मस्ती की और लेक्चरार को सुना। यहां पर कॉलेज के प्राचार्य प्रो.संजय काला का सम्मान किया गया।
बैच ने गरीब बच्चों के अध्ययन में दिक्कत न आए इसलिए छह लाख रुपये जेम पोर्टल को एफडी दिया। हैलट अस्पताल के सीएमएस और कॉलेज में प्रोफेसर डॉ.सौरभ अग्रवाल ने 1971 से लेकर अब तक कॉलेज में क्या-क्या बदलाव हुए है, इसका प्रजेंटेशन दिखाया और जरूरतों को बताया। साथ ही उनका किस तरह से मरीजों को लाभ मिल रहा है, यह भी जानकारी दी।
कॉलेज में हुए बदलावों और मरीजों को मिल रहे आधुनिक इलाज की सुविधा के संबंध में सीनियर डॉक्टरों ने कॉफी सराहना की। डॉ.सीएम वर्मा ने कहा कि डॉक्टरों को लंबे और अनियमित काम के घंटे, तनावपूर्ण और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण स्थितियां (जैसे बुरी खबर देना), मरीजों के साथ मुश्किल बातचीत व लगातार बदलते चिकित्सा ज्ञान के साथ तालमेल बिठाने समेत आदि अनेक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा वह कभी-कभी प्रशासनिक बोझ और कम संसाधनों जैसी चुनौतियों का भी सामना करते हैं। ऐसे में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में बढ़ी स्वास्थ्य सुविधाएं काफी काबिले तारीफ हैं। डॉ.आरती लाल ने बताया कि कॉलेज में स्वर्गीय डॉ.विनोद महता ने कंप्यूटर उपलब्ध कराए थे। डॉक्टरों ने गरीब बच्चों के अध्ययन के बारे में सोचा था।
नई तकनीक से डॉक्टरों का प्रशिक्षित होना जरूरी
डॉ.आलोक राजेश्वरी, डॉ.विनोद, डॉ.मधु कपूर, डॉ.शारदा वर्मा, डॉ.सुनील मोदी ने बताया कि पहले अस्पताल में डॉक्टरों को टॉर्च की रोशनी में इलाज करना पड़ता था, मरीजों को लंबे समय तक बेड पर समय बीतना होता था, बीमारी की पहचान देर से होती थी और सर्जरी आदि में बड़े टाके लगाने पड़ते थे, लेकिन अब अत्याधुनिक मशीनों और एआई आधारित मशीनों से मरीजों को जटिलताओं से होकर अधिक गुजरना नहीं पड़ रहा है। नई तकनीक के संबंध में सभी डॉक्टरों को प्रशिक्षण जरूर प्राप्त करना चाहिए। साथ ही समय के साथ खुद को भी अपडेट करना काफी जरूरी है। लेकिन इस बीच सेवाभाव का ख्याल जरूर रखना चाहिए।
