अवतारवाद: विकासवाद का अध्यात्मपरक वैज्ञानिक विमर्श

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Edited By Anjali Singh
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भारतीय धर्म एवं संस्कृति में वर्णित अवतारवाद, विकासवाद का अध्यात्मपरक वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसका मूल उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करना रहा है। अवतार का अर्थ है नीचे उतरना, अवतरित होना, जो दिखाई नहीं दे रहा है, उसका व्यक्त होना, प्रादुर्भाव अथवा आविर्भाव। भगवान द्वारा अवतार लेने के कई कारण बताए गए हैं, जिनमें प्रमुख है धरती का भार उतारना। मूल्यों में आई अनैतिकता तथा अधार्मिकता के कारण जब जागतिक सत्ता और उसके नियमन का विनाश होने लगता है, प्रकाशमय वातावरण अंधकारमय हो जाता है। ऋ त के स्थान पर अनृत और धर्म के स्थान पर अधर्म का प्रभाव बढ़ जाता है, तब-तब पृथ्वी पर मनुष्य या पशु रूप में महानदेव का अवतार होता है, जो इस प्रकार के अधार्मिक, अनैतिक, मूल्यविहीन सत्ता का विनाश करके पुनः धरती पर धर्म, नैतिकता और मूल्ययुक्त आदर्श की स्थापना करता है।

अवतार की सिद्धि दो दशाओं में मानी जाती है-एक तो रूप का परिवर्तन अर्थात् ‘स्व’ रूप का त्याग कर कार्यवश नवीन रूप धारण करना तथा दूसरा है नवीन जन्म ग्रहण कर तद्नुरूप में आना, जिसमें माता के गर्भ में उचित काल तक स्थापित होकर जन्म ग्रहण करना। प्रहलाद के रक्षार्थ अथवा गजेन्द्र को घड़ियाल के बंधन से मुक्त कराने हेतु भगवान विष्णु का अपने रूप में आविर्भाव अवतारों के ‘स्व’ रूप के त्याग का उदाहरण है, जबकि राम-कृष्ण आदि अवतार नवीन जन्म धारण कर अवतरित होने के उदाहरण हैं। अवतार का प्रसंग प्रायः किसी अलौकिक शक्ति संपन्न भगवान के लिए ही उपयुक्त माना जा सकता है।

अवतार कई प्रकार के होते हैं, जैसे पूर्णावतार, अंशावतार, विमावतार, कलावतार, विभूतिवतार, व्यूहावतार, गुणावतार, अर्चावतार आदि। जब भगवान स्वयं प्रकट होते हैं, वह विमावतार कहलाता है। यह साक्षात और आवेश दो प्रकार का होता है। आवेश भी दो प्रकार का होता है-शक्ति आवेश व रूप आवेश। पहले में केवल भगवान की शक्ति किसी प्राणी में आती है और दूसरे में किसी प्राणी के शरीर में भगवान प्रवेश करते हैं और वह भगवान बन जाता है। भगवान की शक्तियां अनंत हैं, परंतु धरती पर अधिकतम 16 कला का ही अवतार होता है, इससे अधिक की आवश्यकता नहीं होती है। जब कला से अवतार होता है वह कलावतार कहलाता है। अवतार में जब कला 1/16 होती हैं, तो वह अंशावतार कहलाता है। इससे कम वाला विभूतिवतार है। सब अवतारों की शक्तियां समान होती हैं, जिस काल में जितनी शक्ति की आवश्यकता होती है उतनी ही शक्ति का प्रयोग किया जाता है। अतएव 16 कला के कृष्णावतार, 9 कला के रामावतार, मोहिनी अवतार और परशुरामावतार सभी बराबर हैं और भगवान हैं। पूर्णावतार में भगवान चतुर्व्यूह में अवतरित होते हैं। वासुदेव, बलराम, प्रदयुम्न और अनिरुद्ध- ये कृष्णावतार के व्यूह हैं। राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न रामावतार के व्यूह हैं। सभी अवतार अपने-अपने कार्य पूर्ण करने के पश्चात सशरीर अपने लोक में चले जाते हैं।

ज्ञान का वितरण

ज्ञान का वितरण भी भगवान के अवतार का प्रयोजन है। भगवान ही सब गुरुओं के गुरु हैं तथा सब ज्ञान के आधार हैं। वहीं से ज्ञान की धारा लोकमंगल के लिए प्रवाहित होती है, जिसके कतिपय बिंदुओं को पाकर मानव धन्य हो जाता है। वह मोक्षाभिलाषी होकर परम श्रेयस को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हो जाता है। इस अलौकिक एवं अनुपम लक्ष्य के समक्ष भौतिक क्लेश का विनाश अवतार का बहुत ही अल्प ध्येय माना जा सकता है। अवतरित अवतार इस लोक में व्याप्त अहितकारी एवं विनाशकारी शक्तियों का शमन करते हुए धर्म की स्थापना करता है।

इस धर्म की स्थापना में आतताइयों द्वारा संसार के मनुष्यों के ऊपर कई तरह जुल्म किए जाते हैं। जैसे- शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक आादि। प्रायः मनुष्य इनसे मुक्त होना चाहता है। अवतार उन्हें इनसे मुक्ति दिलाता है, लेकिन वह उन्हें इस तथ्य से भी अवगत कराता है कि ये सभी भौतिक एवं लौकिक दुःख और ताप हैं। मानव जीवन का लक्ष्य इन क्षुद्र और क्षणिक दुःखों से मुक्ति पाना नहीं है। उसका ध्येय तो पूर्ण मुक्ति पाना है, जो मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य और विवेकख्याति है। यही मनुष्य का चरम लक्ष्य है और मानव जीवन का चरमोत्कर्ष भी। इसकी प्राप्ति ज्ञान, कर्म और भक्ति के द्वारा संभव है, जिनका संदेश एवं मार्ग अवतार ने अनेकशः किया है।