उत्तराखंड का रंगमंच: अपने ही रंगों की तलाश में

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के साथ रंगकर्म की स्थिति उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। थियेटर की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहचान बना चुके वरिष्ठ अभिनेता एवं रंगकर्मी श्रीश डोभाल कहते हैं कि प्रदेश में रंगकर्म आज भी प्रोत्साहन और विजन के अभाव में पिछड़ा हुआ है। पेश हैं  उनसे किए गए चुनिंदा सवालों के जवाब-हरीश उप्रेती करन

थियेटर से निकलता है फिल्मों का रास्ता

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थियेटर सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि समाज का दर्पण है। फिल्मों की ओर जाने का रास्ता थियेटर से होकर ही निकलता है। यहां अनुशासन, गहराई और मनुष्य की आत्मा तक पहुंचने की शक्ति मिलती है। अगर उत्तराखंड इसे अपना ले, तो यहां से भी अगली पीढ़ी के निर्मल पांडे जन्म ले सकते हैं। आज जब मंच के परदे उठते हैं और रोशनी चेहरे पर पड़ती है, तो यह केवल एक नाटक की शुरुआत नहीं होती, बल्कि एक सपने का जीवित होना होता है। हमारे जैसे कलाकार उस सपने को जीते हैं और याद दिलाते हैं कि उत्तराखंड का रंगमंच अभी अपने असली रंगों की तलाश में है।

फिल्म और थियेटर में जमीन-आसमान का अंतर

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फिल्म में गलती सुधारने का मौका होता है, थियेटर में नहीं। यहां दर्शक सामने होते हैं, उनकी सांसें आपके संवाद के साथ चलती हैं। एक चूक और पूरा अभिनय बेअसर। यही इसे कठिन भी बनाता है और खूबसूरत भी।

थियेटर से जीवन की आर्थिकी नहीं चलती

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उत्तराखंड में कॉमर्शियल थियेटर का कोई ढांचा नहीं है। कलाकार अगर मंच से जुड़ा रहना चाहता है, तो उसे दूसरी आजीविका का सहारा लेना ही पड़ता है, जबकि महाराष्ट्र, गोवा या बंगाल में यही थियेटर जीवन जीने का साधन है।

चंबा की रामलीला में कभी बंदर तो कभी राक्षस बने

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मेरे रंगमंच की शुरुआत चंबा की रामलीला से हुई, जहां कभी बंदर तो कभी रावण की सेना में राक्षस बन जाता था। उच्च शिक्षा के लिए देहरादून आया तो जागृति संस्था से जुड़ा और वहीं से रंगमंच की ओर झुकाव बढ़ा। 1981 में एनएसडी में चयनित होने के बाद खुद को पूरी तरह थियेटर को समर्पित कर दिया।

थियेटर के विकास में सरकार को गंभीर होना होगा

Chhath Puja Lucknow Laxman Mela Ground, Gomti River (2)

राज्य सरकार को रंगकर्म को लेकर गंभीर होना चाहिए। रंगकर्मियों के लिए कम से कम एक पुरस्कार तो होना ही चाहिए, ताकि कलाकारों का मनोबल बढ़े। अच्छे ऑडिटोरियम हों और वे आसानी से उपलब्ध भी कराए जाएं, तभी मंच पर नई पीढ़ी आएगी। अगर सरकार और समाज थोड़ी और गंभीरता दिखाए तो उत्तराखंड का रंगमंच भी नई ऊंचाइयों को छू सकता है।

रंगऋषि श्रीष डोभाल का परिचय

15 भाषाओं में नाटकों का निर्देशन, कन्नड़ में आठ नाटकों का मंचन, 35 से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय निर्देशकों के साथ काम और छह नाटकों का अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में सफल मंचन, श्रीश डोभाल का यह सफर, उन्हें सच्चा रंगऋषि बनाता है। राजस्थान के राज्यपाल द्वारा प्रदान किया गया गोल्डन अचीवर्स अवॉर्ड उनकी उपलब्धियों में चार चांद लगाता है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से 1985 में स्नातक रहे श्रीश डोभाल ने प्रकाश झा की परिणति समेत नेशनल अवॉर्ड जीत चुकीं तीन फिल्मों के अलावा आसमां कैसे-कैसे और खिलती कलियां जैसे दो दर्जन से अधिक टीवी धारावाहिकों के अलावा कई टेलीफिल्मों में अभिनय किया है। हाल ही में उन्हें रंगमंच में उल्लेखनीय योगदान के लिए बलराज साहनी नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वह राजकुमार राव अभिनीत ‘बधाई दो’ फिल्म में भी नजर आ चुके हैं। उनकी गढ़वाली फिल्म ‘रैबार’ 19 सितंबर को देश के प्रमुख शहरों और अमेरिका में रिलीज हुई है।