गोरखधंधा- किस्त- 3 : 'जादू का पानी' से होता पशुओं का इलाज
प्रशांत सक्सेना, लखनऊ, अमृत विचार : 'जादू का पानी' सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगता है लेकिन सच मानिए यह एक ऐसा सिरप है जिसका उपयोग पैदा होने वाले छोटे पशुओं की इम्यूनिटी व ग्रोथ बढ़ाने में किया जाता है। लेकिन एनजीओ चलाने वालों के लिए यह एक मुनाफे का सौदा है जिसे यह कथित संगठन निजी चिकित्सकों की मिली भगत से इसे धंधा बना चुके हैं। इसे पशुओं को पिलाओ या न पिलाओ इसका कोई फायदा और नुकसान नहीं होता है। लोगों का कहना है कि यह खालिस पानी होता है। कोई समझ न पाए इसलिए ''जादू का पानी'' नाम दिया गया है। इस सिरप का इस्तेमाल आवारा पशुओं के उपचार के नाम पर धंधा करने वाले ज्यादातर एनजीओ निजी चिकित्सकों की सांठगांठ से महंगा बिल बनवाने में करते हैं। इसकी एमआरपी 150 एमएल करीब 1700 रुपये है जबकि यह 500 से 600 रुपये में मिल जाती है। लेकिन बिल पूरी एमआरपी का बनता है।
100 रुपये के सिरप से हो जाता है काम, लेकिन खरीद हजारों में
इसी कंपनी के हाई बिलिंग बढ़ाने वाले प्रोडक्ट में खून बढ़ाने का सबसे महंगा इंजेक्शन 3000 रुपये तक की एमआरपी का है। 1700-1800 में इसे खरीदकर शेष राशि कमाते हैं। निजी लैब भी इनमें शामिल रहती हैं। मोबाइल या एप के माध्यम से बिना जांच के ही खून की कमी (एनीमिया) की फर्जी रिपोर्ट बना देते हैं। इसी तरह खांसी, जुखाम व बुखार का सबसे महंगा सीरप 1500 रुपये तक की एमआरपी का बिल बनवाकर वास्तविक कीमत 700 रुपये में खरीदा जाता है। जबकि अन्य कंपनियों के यह सिरप मात्र 100 रुपये तक में मिलते हैं। करीब तीन से सात दिन का कोर्स होता है। इसी तरह ट्यूमर, गांठ, ऑपरेशन आदि में महंगा इलाज दिखाया जाता है। आश्चर्य है कि इतनी महंगी दवाओं का किन परिस्थितियों में प्रयोग हुआ, कितने पशु स्वस्थ हुए व कितनों की जान बची इसके प्रमाण तक नहीं दे पाएंगे जो देते हैं तो भी पुष्टि नहीं कर पाएंगे।
बिल बढ़ाने के लिए जरूरी बता चढ़ाते हैं विदेशी एंटीबायोटिक व ड्रिप
बिल बढ़ाने में तमाम कंपनियों के महंगे हाई एंटीबायोटिक विदेशी बताकर बिना जरूरत के प्रयोग होते हैं। सबसे महंगा एंटीबायोटिक 350-300 रुपये कीमत का 800 से 1200 एमआरपी पर बिल बनते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जरूरत नहीं होती है। सस्ते इंजेक्शन और टेबलेट इनसे अच्छे विकल्प हैं। ड्रिप 1200-1300 एमआरपी की बिल में दिखाकर वास्तविक कीमत 600-700 रुपये में खरीदते हैं।
चिकित्सक गोलमोल, नहीं दिखाते चेहरा
ज्यादातर एनजीओ चिकित्सकों के पास सिर्फ हाई बिल बनाने के लिए ही कुछ पशुओं को उनके क्लीनिक ले जाते हैं। ड्रिप, भर्ती, इंजेक्शन परामर्श समेत कई चार्ज बनाते हैं। उपचार का वीडियो व फोटो में चिकित्सक का चेहरा नहीं दिखाते। इससे स्पष्ट नहीं होता कि चिकित्सक पंजीकृत है या झोलाछाप। क्लीनिक और शेल्टर होम पर भी काम करने वाले कर्मचारी अप्रशिक्षित और बिना डिग्री व डिप्लोमा के रखे हैं।
मरने के बाद भी रुपये मांगने के लिए घूमता रहता मैसेज
एनजीओ द्वारा घायल पशुओं के उपचार का वीडियो रुपये मांगने के लिए एक ग्रुप में साझा करते हैं। उसमें से उन्हीं के दो से तीन लोग दूसरे ग्रुप में चेन की तरह मैसेज शेयर करते हैं जो देश-विदेश तक सैकड़ों ग्रुपों से लाखों-करोड़ों पशु प्रेमियों तक पहुंचता है। वीडियो में कोई तारीख नहीं होती है, इसलिए पशु के मरने तक जब तक वायरल होता है तब तक वास्तविक पशु प्रेमी भावुक होकर रुपये डोनेट करते हैं।
एनजीओ पर ये सवाल, की जाए खातों की जांच
- बैंक खातों व क्यूआर कोड की जांच
- ज्यादातर का ऑडिट नहीं होता
- कितना लेनदेन व किन चीजों पर
- किस चिकित्सक को कितना भुगतान
- दवाएं, खानपान आदि के पक्के बिल
- शेल्टर होम के मानक व रखरखाव पर खर्च
- कितने पशुओं पर कितने देखभाल के लिए कर्मी
जानिये क्या बोले अधिकारी
जिले में शेल्टर होम की जांच शुरू कर दी है। जानकारी जुटा रहे हैं। हर एक मानक पर जांच करेंगे। गड़बड़ी व नियम विरुद्ध मिलने पर कार्रवाई करेंगे।
- डॉ. सुरेश कुमार, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी।
