लखनऊ में बोले भावी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत : केस को जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है उसमें न्याय मिलना
लखनऊ, अमृत विचार। किसी मुकदमें को जीतने से ज्यादा जरूरी न्याय मिलना है। जीवन में आत्ममंथन अत्यंत आवश्यक है। "क्या मेरी तैयारी पूरी थी? क्या मैंने मुकदमे में बहस सही से की?" जैसे सवाल खुद से पूछने की आदत सुधार की दिशा में पहला कदम है। यह कहना है देश के होने वाले चीफ जस्टिस सूर्यकांत का। वह रविवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि हमारे लिए जीवन पद्धति का हिस्सा सत्य बोलो और धर्म की रक्षा करो है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने छात्रों से अपने वकालत के दौर का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि एक बार अतिआत्मविश्वास के कारण वह केस हार गए थे। उसके बाद से उन्होंने हर केस के लिए नोटबुक रखना शुरू किया ताकि हर गलती से सीख ली जा सके। उन्होंने नए विधि स्नातकों को अतिआत्मविश्वास से बचने और विनम्रता बनाए रखने की सलाह दी।
समारोह में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने विद्यार्थियों को तीन मंत्र दिए मेहनत, ईमानदारी और खुशमिजाजी। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इन तीन बातों का पालन करता है, वह जीवन में अवश्य सफल होता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था जितनी सशक्त होगी, सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त करना उतना ही आसान होगा। यही वह व्यवस्था है जिसे हमारे पूर्वजों ने रामराज्य कहा था। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, "पहले हमारे डीजे के चैम्बर में एसी नहीं था। आज ये लग्जरी नहीं, जरूरत है, ताकि जब बार को गुस्सा आए तो एसी से गुस्सा ठंडा हो सके।" मुख्यमंत्री ने सभी उपाधिधारकों के लिए गौरव का क्षण बताते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्य बोलना और धर्म का आचरण करना है। समारोह में इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण कुमार भंसाली, उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह, और कुलपति प्रो. अमरपाल सिंह भी मौजूद रहे। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की विभिन्न पाठ्यक्रमों के 309 विद्यार्थियों को उपाधियाँ और 21 मेधावियों को स्वर्ण, रजत, कांस्य व स्मृति पदक प्रदान किए गए। विशेष स्वर्ण पदक पाने वालों में प्रदीप कुमार अग्रवाल, मुस्कान शुक्ला, दर्शिका पांडेय, धीरज दिवाकर और अभ्युदय प्रताप शामिल हैं। इस वर्ष 24 पीएचडी उपाधियाँ भी प्रदान की गईं।
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