Special News: कैंपस में पहला दिन... ‘बड़े’ होने की हुई शुरुआत
स्कूल से कॉलेज तक का सफर जैसे किसी बंद कमरे से खुली हवा में कदम रखना हो। स्कूल की ड्रेस, भारी बैग और रोज-रोज के होमवर्क से आजादी का एहसास अलग ही था। उस दिन सुबह जब आईने में खुद को देखा तो लगा- अब मैं बड़ा हो गया हूं। कॉलेज के पहले दिन दिल में उत्साह भी था और थोड़ी-सी घबराहट भी थी।
नए माहौल, नए लोग और नए शिक्षक सब कुछ नया था। गेट पर खड़े होकर कुछ पल के लिए ठिठक गया, मानो कोई नया अध्याय शुरू होने से पहले दिल खुद को संभाल रहा हो। कैंपस में कदम रखते ही चारों ओर हंसी, बातें और परिचय का शोर। कोई अपने दोस्तों के साथ फोटो खिंचवा रहा था, तो कोई क्लास ढूंढने में व्यस्त। पहली क्लास में जब प्रोफेसर साहब ने ‘वेलकम टू कॉलेज लाइफ’ कहा, तो लगा जैसे किसी ने जिंदगी के अगले दरवाजे खोल दिए हों। यहां किताबों के साथ-साथ रिश्ते, अनुभव और आत्मविश्वास भी पढ़ना था।
स्कूल की तरह सख्त अनुशासन नहीं, बल्कि सोचने और अपने विचार रखने की आजादी थी। ब्रेक के समय कैंटीन में समोसे और चाय के साथ नई दोस्ती की शुरुआत हुई। कुछ ही घंटों में अजनबी चेहरे अपनापन देने लगे। शाम को जब घर लौटा तो थकान नहीं, बल्कि चेहरे पर एक अलग-सी चमक थी। कुछ नया पाने की, कुछ बनने की। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो एहसास होता है कि कॉलेज का पहला दिन ही असल में ‘बड़े होने’ की शुरुआत थी, जहां किताबों से ज्यादा जिंदगी सिखाई जाती है।
-शिव शंकर सोनी
शिक्षक, मवई, अयोध्या
