योजनाओं की नाकामी

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Edited By Amrit Vichar
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नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वेक्षण (एनएचएफएस)-5 के हालिया आंकड़े चिंताजनक हैं, जिसमें बिहार के 69 फीसदी बच्चों और 63 फीसदी महिलाओं को खून की कमी (एनीमिया) की शिकार बताया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए इन आंकड़ों में चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले चार साल के …

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वेक्षण (एनएचएफएस)-5 के हालिया आंकड़े चिंताजनक हैं, जिसमें बिहार के 69 फीसदी बच्चों और 63 फीसदी महिलाओं को खून की कमी (एनीमिया) की शिकार बताया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए इन आंकड़ों में चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले चार साल के दौरान रक्त की कमी वाले बच्चों और महिलाओं की संख्या में छह फीसदी की वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य मानव जीवन से जुड़ा बेहद अहम मुद्दा है और यह सरकार की जिम्मेदारी का विषय है। यही वजह है कि केंद्र सरकार राज्यों को बाल विकास और पोषाहार विभाग के माध्यम से बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषाहार पर हर साल बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करती है। इसके अंतर्गत बच्चों और महिलाओं को प्रतिदिन पोषाहार के नि:शुल्क वितरण का प्रावधान आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से किया जाता है। इसके बावजूद एनीमिया का शिकार होने वाले बच्चों और महिलाओं की संख्या कम होने के बजाय बढ़ने से यह आंकड़े बहुत सारे सवाल खड़े करते हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक बड़ी आबादी निम्नवर्गीय जीवन व्यतीत करती है। इनके लिए दो वक्त की रोजी-रोटी उपलब्ध हो पाना आसान नहीं होता। ऐसे में, इनके लिए पर्याप्त पोषण वाला भोजन महज कल्पना ही है। इसी को ध्यान में रखकर निम्नवर्गीय परिवार के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सरकार की ओर से पोषाहार का नि:शुल्क वितरण किया जाता है।

सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन का प्रावधान भी इसी कड़ी में किया गया है लेकिन क्या वजह है कि एनीमिया और कुपोषण कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है? अहम सवाल यह भी है कि क्या पोषाहार का वितरण जरूरतमंदों तक नहीं किया जाता? ऐसी खबरें आती रहती हैं कि जो आंगनवाड़ी केंद्र हर दिन खुलने चाहिए, अक्सर वे सुदूर ग्रामीण अंचलों में बंद रहते हैं। इसी तरह बहुत सारे स्कूलों में मध्यान्ह भोजन का वितरण नियिमत नहीं किया जाता।

जाहिर है कि यह स्थिति पोषाहार और मध्यान्ह भोजन वितरण की व्यवस्था में खामियों की ओर इशारा करती है। केंद्र और राज्य सरकारें योजनाओं के बजट जारी करती हैं लेकिन धरातल पर योजनाओं को ले जाने के लिए जिम्मेदार लोग मनमानी करते हैं। नतीजतन, अच्छी से अच्छी योजनाएं भी भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का शिकार होकर रह जाती हैं। ऐसे में, सरकार की यह भी अहम जिम्मेदारी है कि वह योजनाओं के िक्रयान्वयन के लिए ऐसी पारदर्शी और मजबूत व्यवस्था बनाए जिससे किसी भी योजना का लाभ वास्तविक व्यक्तियों तक पहुंच सके।