श्रीराम-जानकी विवाह - 25 नवंबर 2025 विशेष : कोउ कह संकर चाप कठोरा...
विश्व के सर्वाधिक देशों की विभिन्न भाषाओं में रामकथा के विभिन्न प्रसंग अद्भुत संवाद योजना और अभिनय की दृष्टि से एकाधिक रूप में मिलते हैं, उन समस्त प्रसंगों में श्री जानकी-रामविवाह सर्वाधिक आनंदप्रद और सम्मोहनकारी है। कविकुल-शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति की पृष्ठभूमि दास्य भावना पर आधारित है। वे विनयभाव से रामकथा के अप्रतिम प्रस्तोता हैं, परंतु इस प्रसंग का उल्लेख वे बड़े नेहपगे मन से करते हैं। रस प्रधानता की दृष्टि से रामचरितमानस भक्ति रस प्रधान ग्रंथ है। कवि की प्रत्येक चौपाई में शील और सम्मान तथा भक्तिभावना की व्याप्ति है। - संतोष कुमार तिवारी
नैनीताल
मानस के बालकांड में श्रीरामजानकी के विवाह में विदेहराज जनक जी द्वारा आयोजित सीता-स्वयंवर में दशरथनंदन राजकुमार द्वय- राम और लक्ष्मण ऋ षि विश्वामित्र के साथ रंगभूमि में आकर्षण के केंद्रबिंदु हैं। गोस्वामी जी बालकांड में जनकपुर नगर, हाट, भवन तथा वीथियों सहित निवासियों की प्रशंसा प्रमुखता से करते हैं-
चारु बजारु बिचित्र अंबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर संवारी|।।
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।।
अति अनूप जहं निवासू। विथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।।
ऋ षि विश्वामित्र के जनकराज से मिलने पर दोनों भाईओं का परिचय कराते हुए बताते हैं कि ये दोनों बालक सामान्य बालक नहीं हैं। इनकी स्तुति तो ब्रह्मा जी भी गाते हैं। परम पौरुषवान होने के फलस्वरूप मैंने यज्ञ की रक्षा हेतु दोनों बालकों को अयोध्या नरेश दशरथ से मांगा है।
यह दोनों चक्रवर्ती दशरथ जी की संतान हैं। उनका परिचय यज्ञभूमि तक सीमित नहीं रह जाता। दोनों भाईयों को जनकपुर नगर भ्रमण करते देख स्त्रियां परस्पर बातें करती हैं कि राजा दशरथ और कौशल्या के यह दोनों पुत्र मानो हंसों का जोड़ा है। मेरा मन तो यही कहता है कि फूल जैसी सुकुमारी सीता के लिए इन्हें वर रूप में वरण हेतु विधाता ने यहां भेजा है। यह संयोग अद्भुत ही नहीं मंगलकारी भी है।
वहीं दूसरी सखी कोउ कह संकर चाप कठोरा, ए स्यामल मृदु गात किसोरा कहकर संदेह व्यक्त करतीहै, लेकिन तीसरी स्त्री संदेह दूर करते हुए कहती है कि इनके जैसा कोई और नहीं है। ये देखने में छोटे हैं, परंतु इनका प्रताप असीम है। शील-गुण-धाम श्रीराम जी अनुज लक्ष्मण को लेकर पुष्पवाटिका में उपस्थित हैं तभी गिरिजापूजन के लिए सीता सखियों सहित प्रवेश करती हैं। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, मिथिलेश नंदिनी रूप-अनूप देखकर थोड़ी मुदित,थोड़े संकोच में पड़ जाती हैं।
आमंत्रित राजा-महाराजाओं के अलावा भी सीता स्वयंवर देखने के लिए रंगभूमि में किन्नर, यक्ष, गंधर्व, नाग सहित तीनों लोकों के महिपाल भिन्न-भिन्न रुपों में उपस्थित थे। सीता के हाथों वरमाला पहनने की उत्कंठा भला कौन गंवाना चाहेगा। शुभ मुहुर्त में सयानी सखियों के संग सीता स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़ीं। देवताओं ने फूल बरसाए, अप्सराएं नृत्यमग्न हो गईं। सीता तिरछे नैन से राम की ओर देखकर आगे बढ़ती हैं, उनकी इस भंगिमा में पुकार, सत्कार भी और प्रथम-दर्शन का अनुराग भी एक साथ अंतर्निहित था।
यह प्रेमपगा अद्भुत प्रसंग रामचरितमानस सहित समस्त रामकथा की अनूठी निधि है। साक्षात् जगत जननी जगदंबा को भार्यारूप में प्राप्त करने की दिग्गज महीपालों में होड़ है, परंतु धनुष को भंग करना तो दूर उसे लेशमात्र वे समस्त स्वनामधन्य राजागण हिला तक नहीं पाए। वस्तुत: उनकी अभिलाषा वासनाजनित और उत्कंठा में अहंकार-पोषित थी।
विभिन्न राजा-महाराजाओं को लंबी-लंबी डींगें मारने और लज्जित होकर वापस अपने स्थान पर बैठने के पश्चात विश्वामित्र ने राजा जनक की निराशा दूर करते हुए रामजी को आदेश दिया। वे अत्यंत सहज भाव से शिव के धनुष को तिनके के समान उठाकर खंडित कर देते हैं। धनुष खंडन के पूर्व और पश्चात सम-भावी श्रीराम गुरु विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं।
सीता के आनंद का कोई ओर-छोर नहीं। वे प्रेम-विवश हो गईं। जनक जी ने अयोध्या संदेश भेजा। राजा दशरथ अनुरोध स्वीकारते हुए बारात लेकर जनकपुर पहुंचते हैं। राम सहित तीनों भाइयों के एक ही मंडप के विभिन्न कोबहरों में विवाह तीनों लोक के देवी-देवताओं की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
