बोधकथा: अंतर्मन का दीपक

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Edited By Anjali Singh
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नदी के किनारे बसे सुंदर से एक गांव में लोग अपनी सरलता और परिश्रम के लिए जाने जाते थे। इसी गांव में एक बालिका रहती थी, जिसका नाम रिया था। यूं तो रिया बहुत ही बुद्धिमान, विनम्र और मेहनती थी, किंतु उसमें एक कमी थी। वह प्रत्येक कार्य दूसरों की प्रशंसा पाने के उद्देश्य से करती थी। यदि काम की सराहना होती, तभी वह प्रसन्न रहती। वहीं यदि कोई उसके कार्य पर ध्यान न देता, तो उसका मन निराश हो जाता। एक दिन उसके विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी की घोषणा हुई। प्रधानाचार्य ने बच्चों को अपने-अपने प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा। रिया ने खूब मेहनत करके एक सुंदर जल-चक्र मॉडल बनाया। उसने सोचा, “इस बार तो मेरी खूब प्रशंसा होगी।”

प्रदर्शनी के दिन उसने अपना मॉडल सजाकर रखा, लेकिन लोगों की भीड़ उसे अनदेखा करते हुए एक अन्य बच्चे के विज्ञान प्रयोग के पास जा रही थी। रिया का मॉडल एक कोने में जस का तस पड़ा था। वह उदास हो गई, उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसे लगा कि उसकी सारी मेहनत व्यर्थ गई। वह सर झुकाकर बैठी थी कि अचानक उसके पास गांव के सबसे वृद्ध व्यक्ति रामू बाबा आए, जो अपने ज्ञान और अनुभव के लिए जाने जाते थे। उन्होंने रिया से पूछा, “बेटी, रो क्यों रही हो?” रिया ने सिसकते हुए कहा, “बाबा, मैंने इतना सुंदर मॉडल बनाया, लेकिन इसे किसी ने देखा तक नहीं। ऐसी मेहनत का क्या लाभ, यदि लोग उसकी प्रशंसा ही न करें?” बाबा मुस्कुराए और बोले, “आओ, मेरे साथ चलो।” वे उसे पास बने एक कुएं के पास ले गए। वहां उन्होंने दीपक जलाया और कहा, “बेटी, यह दीपक देखो। क्या यह इसलिए जल रहा है कि कोई इसकी प्रशंसा करे? नहीं, यह इसलिए जल रहा है, क्योंकि इसका स्वभाव ही प्रकाश देना है। चाहे कोई इसे देखे या न देखे, यह हमेशा अपना कर्तव्य निभाता रहता है।”

रिया बड़े ध्यान से दीपक को देखने लगी। बाबा बोले, “ठीक इसी प्रकार मनुष्य का कर्तव्य है-अपने कार्य में पूर्णता और सत्यता लाना। यदि हम प्रत्येक कार्य केवल प्रशंसा के लिए करें, तो हमारा मन बाहर के संसार पर निर्भर हो जाएगा, लेकिन यदि हम अपने भीतर के संतोष के लिए काम करें अर्थात अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तो हमारी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाएगी।” उन्होंने रिया के मॉडल को ध्यान से देखा और कहा, “यह बहुत सुंदर और उपयोगी है, लेकिन वास्तविक मूल्य तुम्हारी मेहनत और सीखने की इच्छा में है, न कि दूसरों की तालियों में।” 

रिया के अंधेरे मन में मानो किसी ने ज्ञान का दीप जला दिया था। वह समझ चुकी थी कि सच्चा आनंद अपने प्रयासों में निष्ठा और तत्परता से आता है, न कि बाहरी प्रशंसा से। वह मुस्कुराकर बोली, “अब मैं हर काम अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए करूंगी, न कि लोगों को दिखाने और उनकी प्रशंसा पाने के लिए।” प्रदर्शनी समाप्त होने के बाद जब विद्यालय के शिक्षकों ने सभी मॉडलों का मूल्यांकन किया, तो उन्होंने पाया कि रिया का मॉडल ही सबसे सटीक और सुंदर बना था। परिणामस्वरूप उसे प्रथम पुरस्कार मिला। किंतु इस बार रिया की खुशी का कारण पुरस्कार नहीं था, बल्कि यह कि उसने अंतर्मन के दीपक को प्रज्वलित करना सीख लिया था।-शिशिर शुक्ला, शाहजहांपुर