जहां अलख निरंजन की गूंज आज भी सुनाई देती है
बरेली का नाम लेते ही बहुतों के मन में सबसे पहले “नाथ नगरी” की छवि उभरती है। कहा जाता है कि इस नगर की आत्मा शिव में बसती है। यहाँ की हवा में भभूती की महक है, और गलियों में हरदम किसी योगी के कदमों की आहट सुनाई देती है। वैदिक काल से चली आ रही परपंरा अलखनाथ मंदिर इसकी गवाही दे रहा है। बरेली का अलखनाथ मंदिर केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि वैदिक युग की आस्था, योग-परंपरा और नागा साधुओं की साधना-भूमि का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि यह 6500 वर्ष पुराना है। यदि इसे 6500 वर्ष पुराना माना जाए, तो यह काल लगभग 4475 ईसा पूर्व या विक्रम संवत −4532 के आसपास आता है। यह वही समय था जब प्रारंभिक वैदिक सभ्यता (सप्तसिंधु क्षेत्र) में यज्ञ, वेद पाठ और शिव-अग्नि-सूर्य उपासना का आरंभिक रूप प्रचलित था। उस युग में पूजा के केंद्र प्रकृति आधारित होते थे यानि बरगद, पीपल और यज्ञ कुंड के रूप में। अलखनाथ मंदिर का प्रमुख प्रतीक बड़ (बरगद) के नीचे स्थित शिवलिंग इसी वैदिक परंपरा की निरंतरता का संकेत देता है। इससे यह स्थल वैदिक युग की प्राकृतिक देव-उपासना परंपरा और आधुनिक मंदिर पूजा प्रणाली के बीच एक सेतु प्रतीत होता है।
बरेली के पुराने हिस्से में जब आप अलखनाथ या त्रिवतीनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हैं, तो लगता है मानो किसी सुरंग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ शोर नहीं, केवल अलख निरंजन की अनुगूंज है। अलखनाथ मंदिर — जिसे बरेली का आध्यात्मिक केंद्र कहा जाता है — नाथ संप्रदाय का सबसे प्रमुख स्थान है। इसका नाम ही बताता है कि यहाँ अलख निरंजन की उपासना होती है, यानी उस परम सत्ता की, जिसे देखा नहीं जा सकता पर महसूस किया जा सकता है।

अलखनाथ मंदिर का इतिहास: साधना की अनंत परंपरा
अलखनाथ मंदिर बरेली शहर के हृदय में स्थित है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले विशाल नंदी की मूर्ति दिखाई देती है। चारों ओर साधुओं के छोटे-छोटे कुटीर हैं, जिनमें वर्षों से तप कर रहे नागा बाबा, सिद्ध योगी और गृहस्थ भक्त रहते हैं। मंदिर की दीवारों पर समय की परतें जमी हैं — जिनमें भक्ति, साधना और तप की कहानियाँ लिखी हैं। लोककथाओं के अनुसार, गुरु गोरखनाथ के शिष्य अलखनाथ ने यहाँ साधना की थी। उनके नाम पर ही यह स्थान प्रसिद्ध हुआ। हर वर्ष चैत्र मास में लगने वाला अलखनाथ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और लोकसंस्कृति का उत्सव बन चुका है। नागा साधु यहाँ अपने अखाड़ों के साथ पहुँचते हैं, भभूती रमाते हैं और अलख पुकारते हैं अलख निरंजन

महंत कालू गिरी कहते हैं कि यह स्थान केवल शिवभक्तों का नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का है जो सत्य की तलाश में है। यही कारण है कि यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन — सभी श्रद्धालु बिना भेदभाव के दर्शन करने आते हैं। बताते हैं कि आनंद अखाड़े के अध्यक्ष गुरुदेव देवगिरी, धर्मगिरी, बालकगिरी की समाधि भी मंदिर में ही है।
अलखनाथ मंदिर की सज्जा
मंदिर की वास्तुकला मंदिर पारंपरिक और आधुनिक वास्तुकला शैलियों का मिश्रण दर्शाता है। इसमें जटिल नक्काशी, सुंदर कलाकृति और एक विशाल प्रांगण है। गर्भगृह में मुख्य देवता, भगवान शिव, एक शिवलिंग के रूप में स्थित हैं। मंदिर महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों के दौरान बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है। खासकर श्रावण महीने (जुलाई-अगस्त) के दौरान जब भक्त प्रार्थना करते हैं और विशेष अनुष्ठान करते हैं। महाशिवरात्रि, सावन सोमवार और कार्तिक पूर्णिमा कुछ प्रमुख अवसर हैं जिन्हें मंदिर में भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

तपेश्वर नाथ मंदिर
तपेश्वरनाथ मंदिर के पुजारी बिशन महाराज बताते हैं कि यह मंदिर साधु संतो की तपस्थली रहा है। यहां पहले वन हुआ करता था। इसी के पास रामगंगा नदी बहती थी। वन में एक बाबा ने कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा हिमालय से लौटते समय महर्षि के शिष्य ने यहां सैकड़ो वर्ष तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां स्वयं विराजमान हुए। तभी से इसका नाम तपेश्वर नाथ पड़ा। महाराज बताते हैं कि यह सिद्धपीठ मंदिर है।

मढ़ीनाथ मंदिर शिवभक्तों के प्राचीन और अत्यंत आस्थावान धामों में गिना जाता है। यह स्थान अपनी शक्ति, सिद्धि और शांत आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि मढ़ीनाथ की भूमि सदियों से साधकों, संतों और श्रद्धालुओं की पूजा–साधना का केंद्र रही है।मढ़ीनाथ मंदिर को कई स्थानीय ग्रंथों और लोककथाओं में बहुत प्राचीन शिव-पर्वत स्थल बताया गया है।इसकी स्थापना का काल सटीक रूप से प्रमाणित नहीं है, लेकिन परंपरा के अनुसार यह स्थान कई सौ वर्षों से शिवभक्ति का प्रमुख केंद्र है। मढ़ीनाथ क्षेत्र में पहले तपस्वी साधु ध्यान और तपस्या करते थे। इन्हीं साधकों की साधना शक्ति से यहाँ शिव की चेतना प्रकट होने की मान्यता है। स्वयंभूत ऊर्जा का स्थानमढ़ीनाथ को “सिद्ध पीठ” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ की ऊर्जा साधारण मंदिरों से अधिक प्रबल मानी जाती है। यहाँ रूद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।सावन, महाशिवरात्रि और सोमवार को यहाँ भक्तों की भारी भीड़ रहती है।
कई परिवारों में किसी भी नए काम की शुरुआत से पहले मढ़ीनाथ के दर्शन की परंपरा है।
मढ़ीनाथ से कई रोचक कथाए जुड़ी हैं—
कहा जाता है किसी समय यहाँ एक संत ने कठिन तपस्या की थी। उनके तप से प्रसन्न होकर शिव शक्ति ने यहाँ स्वयंभू स्वरूप में प्रकट होने का वरदान दिया।
एक अन्य कथा में माना जाता है कि मढ़ीनाथ महादेव नजर दोष, संकट और खतरों को दूर करते हैं। इसी कारण कई लोग यहाँ विशेष पूजा कराते हैं।
मढ़ीनाथ केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि स्थानीय समाज का सांस्कृतिक केंद्र भी है।
मढ़ीनाथ मंदिर बरेली की आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग है।

पशुपति नाथ मंदिर
यह सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शिव मंदिरों में से एक है। इसकी स्थापना 2001 में पीलीभीत बाईपास के पास की गई थी और इसे नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है यह मंदिर व्यापारी जगमोहन सिंह के मन में आए विचार से अस्तित्व में आया, जो स्वयं नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन के लिए जाया करते थे। उन्होंने 2001 में बरेली में इस मंदिर की स्थापना कराई। मंदिर का नाम जगमोहन नाथ के नाम से भी जाना जाता है। यहां के प्रमुख शिवलिंग के चारों ओर 108 शिवलिंग स्थापित किए गए हैं, जो भगवान शिव के 108 नामों को समर्पित हैं। मंदिर की स्थापना में जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी भी शामिल हुए थे धार्मिक महत्व यहां पंचमुखी शिवलिंग स्थापित किया गया है, जो नेपाल मंदिर की विशेषता भी है। मंदिर में 108 छोटे शिवलिंग भगवान शिव के विभिन्न नामों के प्रतीक हैं और इन पर जल अर्पित करने से भक्तों को मानसिक शांति प्राप्त होती है। सावन महीना विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जिसमें हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां के सरोवर में मछलियों को भोजन देने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पशुपतिनाथ जरूर पूरी करते हैं
विशेषताएं
मंदिर का परिसर एक सुंदर सरोवर और पर्यटन स्थल के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें मछलियां, बत्तख और रामेश्वरम के रामसेतु से लाए गए तैरते पत्थर आकर्षण के केन्द्र हैं । परिसर में कैलाश पर्वत की झांकी, भैरव मंदिर, रुद्राक्ष और चंदन के वृक्ष भी हैं।
परिसर में रोजाना भव्य शिव श्रृंगार और आरती होती है।यहां आने वाले भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करने पर उनकी हर मनोकामना पूरी होती है।
काशी और अयोध्या की तर्ज पर बरेली के सात नाथ मंदिरों को पर्यटन के नक्शे पर पहचान दिलाने के लिए नाथ कॉरिडोर का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। त्रिवटीनाथ मंदिर व मढ़ीनाथ मंदिर के साथ रामनगर के निर्माण कार्यों को कराया जा रहा है। कॉरिडोर के अंतर्गत सात नाथ मंदिरों को आने-जाने वाली सड़कों के निर्माण की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी को मिली है। करीब 36 करोड़ से सड़कें बनेंगी। वहीं, बाबा वनखंडी नाथ मंदिर में करीब पांच करोड़ रुपये, तपेश्वरनाथ मंदिर में 8.36 करोड़ रुपये, धोपेश्वरनाथ मंदिर में करीब 7 करोड़ रुपये, अलखनाथ मंदिर में करीब 11.50 करोड़ रुपये से कार्य होंगे। नाथ कॉरिडोर के अंतर्गत तुलसी मठ में करीब 9.71 करोड़ रुपये से कार्य होंगे। मठ का प्रवेश द्वार बनेगा। स्टोर, भंडार गृह, धर्मशाला बनेगी। वैदिक लाइब्रेरी सहित अन्य कार्य होंगे।
