मेरा शहर मेरी प्रेरणा : कामयाबी की मिसाल हैं रिदम अब फोकस ओलंपिक पर

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Edited By Amrit Vichar
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मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है. ये कहावत तो आपने खूब सुनी होगी, लेकिन बरेली की पैरा एथलीट रिदम शर्मा ने इसे सच कर दिखाया। 18 साल की रिदम बचपन से न बोल सकती है और न सुन सकती है, फिर भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीत चुकी है। 

रिदम की कहानी सिर्फ पदकों की नहीं, बल्कि जज्बे, संघर्ष और प्रेरणा की कहानी है। उन्होंने साबित किया है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी असमर्थता सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। रिदम ने उन लोगों के लिए मिसाल कायम की है जो दिव्यांग हैं। अब रिदम का एक ही सपना है ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाना। 2023 में इंदौर में हुई 35वीं राष्ट्रीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 200 मीटर, 100 और 400 मीटर दौड़ में पदक जीते। 2024 में अंतर्राष्ट्रीय गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर  नाम रोशन किया। कुआला लंपुर मलेशिया में एशियाई डीफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर मिक्स रिले और 4&400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक, जबकि 400 मीटर बाधा दौड़ में रजत पदक अपने नाम कर इतिहास रच डाला। रिदम ने दो बार राज्य स्तर पर गोल्ड, दो बार राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड और एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीता।

रिदम बरेली के बड़ा बाजार इलाके की रहने वाली हैं। उनके पिता अनुकाम शर्मा प्राइवेट नौकरी करते हैं और मां पूनम शर्मा हाउस वाइफ हैं। दोनों ने मिलकर अपनी बेटी के सपने को उड़ान दी। रिदम लिप रीडिंग तकनीक से संवाद करती हैं और 12 साल की उम्र में उन्होंने तय कर लिया था कि वह एथलीट बनेंगी। रिदम के परिवार में एक बड़ी बहन अपूर्वा और छोटा भाई विनायक है।

मां पूनम शर्मा ने बताया कि रिदम को बचपन से ही टीवी पर खेल देखने का शौक था। चार से पाच साल की उम्र में रिदम ज्यादा कुछ समझ नहीं पाती थीं, लेकिन टीवी चैनल परिवार में कोई चेंज कर देता तो खुद अपने पसंद का स्पोर्ट चैनल लगा लेती थीं, इसके बाद पेरेंट्स को रिदम की रुचि के बारे में पता चला और सपोर्ट करने लगे।

 जब रिदम पांच साल की थी तो पेरेंट्स यही सोचते थे कि थोड़ा समय और लगेगा फिर बेटी बोलने और सुनने लगेगी। मगर छह साल बीतने के बाद भी कोई रिस्पांस नहीं मिलता तो डाक्टर को दिखाया गया और पता चला कि वह सुन-बोल नहीं सकती। इलाज के लिए बरेली से लेकर दिल्ली तक गए, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते इलाज नहीं करा पाए। 

11वीं की छात्रा रिदम  कड़ी मेहनत कर रही हैं। सुबह चार बजे रेलवे ग्राउंड में तैयारी के लिए जाती हैं।  मदद कोच अजय कश्यप करते हैं। कालेज की तरफ से भी उन्हें एक घंटे की छूट दी गई है। खुद को  फिट रखने के लिए  रोजाना करीब 24 किलोमीटर साइकिल द्वारा अपने घर से रेलवे ग्राउंट तक आना-जाना करती हैं। 

 

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