हाईकोर्ट : SC-ST एक्ट मामलों में समझौते के आधार पर कार्यवाही सीधे अपील में की जा सकती है रद्द

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज मामलों में यदि पक्षकार समझौते पर पहुंच जाएं, तो आपराधिक कार्यवाही को अधिनियम की धारा 14-ए(1) के तहत दाखिल आपराधिक अपील में ही समाप्त किया जा सकता है और इसके लिए सीआरपीसी की धारा 482 (अब बीएनएसएस, 2023 की धारा 528) के अंतर्गत उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का पृथक रूप से आह्वान करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की एकल पीठ ने राहुल गुप्ता और छह अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने माना कि जब विधि द्वारा अपील का वैधानिक उपाय उपलब्ध है, तब धारा 482 के सहारे समान उद्देश्य के लिए दोहरा रास्ता अपनाकर न्यायिक प्रक्रिया को तकनीकी रूप से उलझाना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने ‘गुलाम रसूल खां बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (पूर्ण पीठ) के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 14-ए के तहत अपील योग्य मामलों में सीआरपीसी की धारा 482 के प्रयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती, भले ही न्यायालय की संवैधानिक व अंतर्निहित शक्तियाँ समाप्त न हुई हों। अपील ही वह उचित मंच है, जिसके माध्यम से समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त किए जाने का अनुरोध किया जा सकता है। 

मौजूदा मामले में याची ने मेरठ के विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी अधिनियम द्वारा पारित समन आदेश और आरोप पत्र को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान आईपीसी की विभिन्न धाराओं के साथ एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(वीए) के तहत दर्ज मुकदमे में दोनों पक्षों ने कोर्ट को बताया कि विवाद निजी प्रकृति का था, बिना दबाव के समझौता हो चुका है और निचली अदालत समझौते का सत्यापन भी कर चुकी है। अंत में कोर्ट ने यह भी पाया कि कथित अपराध पीड़ित की जाति के आधार पर नहीं किया गया था और ऐसी स्थिति में कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए समन आदेश, आरोप पत्र और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी, साथ ही शिकायतकर्ता/विपक्षी को निर्देश दिया गया कि वह एक सप्ताह के भीतर प्राप्त मुआवजा राशि संबंधित प्राधिकारी को वापस करे।

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