बरेली : अपनी अलग पहचान बना रहे बरेली के किसान

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
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बरेली, अमृत विचार। जो कभी मुख्य रूप से गन्ना उत्पादक क्षेत्र के रूप में जाना जाता था, अब एक महत्वपूर्ण कृषि क्रांति का साक्षी बन रहा है। यहां के किसान अब केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि केंद्र व राज्य सरकार की प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली नीतियों के साथ-साथ खुद भी इनोवेशन को अपना रहे हैं।

बरेली के किसानों ने ड्रोन तकनीक, आधुनिक सिंचाई प्रणालियों और जैविक खेती को अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है। सबसे बड़ा बदलाव ‘विविधीकरण’ के क्षेत्र में आया है। अब यहां विदेशी ‘ड्रैगन फ्रूट’, वाइन ग्रेप्स और अन्य विदेशी प्रजाति की सब्जियाँ सफलतापूर्वक उगाई जा रही हैं। इस परिवर्तन में एक प्रेरक पहलू बड़े शहरों की बडे़ पैकेज की नौकरी छोड़कर गांव लौटे शिक्षित युवाओं की भूमिका है। इन युवाओं ने आधुनिक कृषि तकनीकों और विदेशी फसलों की खेती से कृषि वैज्ञानिकों तक को चकित कर दिया है, युवाओं ने  साबित कर दिया कि कृषि एक लाभदायक और सम्मानजनक कॅरियर विकल्प है। फसल उत्पादन के अलावा, कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी प्रगति हो रही है। गुजरात की देसी ‘गिर’ गायों का दुग्ध कारोबार यहां आगे बढ़ रहा है। बरेली की अर्थव्यवस्था कृषि के क्षेत्र में एक नया रूप ले रही है।

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अंगूर के साथ अन्य ‘सब ट्रॉपिकल’ फसलें उगाने की अपार संभावनाएं
प्राचीन काल में पांचाल राज्य का हिस्सा रही वर्तमान बरेली विदेशी प्रजाति के अंगूर व इससे बनने वाले वाइन कारोबार में विदेशी बाजारों का प्रभुत्व तोड़ेगी। यहां अंगूर के उत्पादन साथ अन्य ‘सब ट्रॉपिकल’ फसलें उगाने की अपार संभावनाएं हैं। प्रगतिशील किसान अनिल कुमार साहनी ने इसे सिद्ध कर दिया है। वर्तमान में महाराष्ट्र के नासिक में अंगूर की खेती होती है, जबकि अमेरिका समेत कई यूरोपीय देशों में अंगूर की खेती होती है।

जलवायू अनुकूल होने के कारण एक ओर जहां इन देशों में अंगूर का उत्पादन खूब होता है, वहीं इससे खुशबूदार वाइन भी खूब बनती है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में अंगूर के साथ विदेशी वाइन छायी हुई है। विश्व में 80-90 प्रतिशत अंगूर वाइन, जूस व किशमिश बनाने में इस्तेमाल होता है। अब बरेली में भी विदेशी प्रजाति के अंगूर व वाइन का उत्पादन बढ़ सकेगा और बरेली की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बन सकेगी। सरकारी सहयोग मिला तो यह शहर अंगूर की खेती का ‘अन्तर्राष्ट्रीय हब’ बन जाएगा। बरेली को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में ‘जिद’, ‘जज्बा’ व ‘जुनून’ के साथ लगे यहां के टिगरी गांव निवासी प्रगतिशील किसान अनिल कुमार साहनी का कहना है कि आजकल के युवा किसान ‘खेती-किसानी’ को घाटे का सौदा मानकर इससे मुंह मोड़ रहे हैं। वे अपने पूर्वजों की पुश्तैनी जमीन पर खेती करने के बजाय उसे बेचकर शहरी जीवन के चकाचौंध में जाने को आतुर हैं, पर इसमें उन्हें वास्तविक सफलता नहीं मिलनी वाली है।

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विभिन्न किस्में लगा सकते हैं खेत में
किसान अपने खेतों में विभिन्न विदेशी किस्मों की फसलें लगा सकते हैं। प्रगतिशील किसान साहनी ने तो अपने फार्म हाउस में विदेशी अंगूर व अन्य विदेशी पौधे लगाये गए। यहां आम लोगों के खाने में इस्तेमाल होने वाले विदेशी अंगूर के साथ वाइन बनाने वाले विदेशी अंगूर ‘वाइन ग्रेप्स’ भी लगाये गए हैं। इसमें फ्रांस, इटली, आस्ट्रेलिया, ग्रीस आदि देशों की 35 किस्में शामिल हैं। साहनी ने सिंदूर (कमीला जतन) का पेड़ भी यहां लगाया है जो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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सफल खेती के लिए खेतों में उन्नत विदेशी तकनीक जरूरी
साहनी ने अपने फार्म हाउस में खेतों को व्यवस्थित करने के लिए इंग्लैंड से आयातित तार लगाए गए हैं जिसमें अंगूर की लतायें फैली हैं। विदेशी तकनीक से एकीकृत प्रणाली के तहत बागान में सिंचाई की व्यवस्था है। इजराइल की तकनीक के उपकरण से पौधों की मांग के अनुसार सिंचाई होती है, जबकि पारंपरिक तौर पर सिंचाई में मांग के अनुसार सिंचाई की व्यवस्था नहीं होती है।

 ये भी है फार्म हाउस में
- 82 प्रजातियों की चिड़ियां
- 38 प्रकार की तितलियां
- तराई में पैदा होने वाला सिंदूर का पौधा
- फालसे का बाग
- अंजीर का बाग
- कचनार के पेड़
- देसी मेंहदी के पेड़ व आंड़ू का बाग आदि

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पौधों को पिलाया जाता है नीम का तेल
विदेशी तकनीक के तहत पौधों में नीम की तेल की सिंचाई होती है, ताकि कीट प्रबंधन हो सके। फार्म हाउस में लगे अंगूर के पौधों को नीम का तेल पिलाया जाता है। किस पौधे को कितनी जरूरत है, इसका भी अध्ययन किया जाता है। इजराइल की सिंचाई तकनीक इस्तेमाल कर पाइप लाइन बिछाई गई है। यहां हर पौधे को नंबर आवंटित किये गए हैं। साथ ही, इंग्लैंड से आयातित तार लगाये गए हैं। यह तकनीक भी बरेली के किसानों के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी।

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