हाईकोर्ट : 30 साल बाद आजीवन करावास से मिली आजादी, साल 1987 में लगा था 11 लोगों पर हत्या का आरोप
प्रयागराज, अम़त विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीन आरोपियों को बरी करते हुए पाया कि यह गुप्त हत्या थी, जिसे किसी अन्य व्यक्ति ने अंजाम दिया। इसके साथ ही अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है और ट्रायल जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन नहीं किया, साथ ही अनुमानों और साक्ष्यों के अनुचित मूल्यांकन के आधार पर अपीलकर्ताओं के अपराध के संबंध में गलत निष्कर्ष निकाले गए।
उक्त आदेश न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने लाला और अन्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए पारित किया। कोर्ट ने माना कि प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य और चिकित्सकीय साक्ष्य के बीच गंभीर और अपूरणीय विरोधाभास हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके भाई को 11 आरोपियों ने लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार डाला और एफआईआर दर्ज कराने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई। ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को आईपीसी की धारा 147 व 302,149 के तहत पुलिस स्टेशन सोरांव, प्रयागराज में 1987 में दर्ज मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अपील की सुनवाई के दौरान 11 में से 8 आरोपियों की मृत्यु हो जाने से उनके विरुद्ध अपील समाप्त हो गई, जबकि शेष तीन की अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह संभव नहीं है कि 11 हमलावरों ने मृतक को जान से मारने की नीयत से एक घंटे तक पीटा हो और उसके शरीर पर केवल 10 चोटें आई हों।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सूचना मिलने के बाद मृतक का भाई और चाचा न तो हथियार लेकर गए और घटनास्थल तक पहुंचाने के लिए लंबा रास्ता अपनाया। इसके अलावा जिस लाठी प्रहार का विवरण गवाहों ने दिया, वैसी कोई चोट पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं पाई गई। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान मामले में चिकित्सा साक्ष्य प्रत्यक्षदर्शी के प्रत्यक्ष साक्ष्य का पूर्णतः खंडन करता है। शव पर पाए गए घाव प्रत्यक्षदर्शी के साक्ष्य का समर्थन नहीं करते हैं और इस तरह प्रत्यक्षदर्शी और चिकित्सा साक्ष्य में महत्वपूर्ण विरोधाभास मिलता है, जो अभियोजन पक्ष के मामले पर गंभीर संदेह पैदा करता है। कोर्ट ने यह भी माना कि मृतक की हत्या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रात के अंधेरे में की गई थी और अभियोजन पक्ष आरोपी के अपराध को साबित करने में 'पूरी तरह से विफल' रहा, अतः कोर्ट ने तीन जीवित आरोपियों को बरी कर दिया।
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