छत्तीसगढ़ : माँ दंतेश्वरी के दरबार में उमड़ी आस्था, भक्त बनकर पहुंचे कांकेर सांसद भोजराज नाग
कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर में रियासत काल से चली आ रही ऐतिहासिक परंपराओं का जीवंत प्रतीक एवं प्रसिद्ध मेला एक बार फिर श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक रंगों में सराबोर नजर आया। चार दिवसीय इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ स्थित माँ दंतेश्वरी का मंदिर वर्ष में केवल एक ही दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। यही कारण है कि इस दिन दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कांकेर पहुँचते हैं।
नववर्ष के पहले रविवार से प्रारंभ होने वाले इस मेले की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। मेले के प्रथम दिन आसपास के देवी-देवताओं की टोली बाजे-गाजे के साथ राजमहल पहुँचती है, जहाँ राजपरिवार के सदस्यों की उपस्थिति में विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके पश्चात देवी-देवताओं की शोभायात्रा मुख्य मार्गों से होती हुई मेलाभाटा स्थल की ओर प्रस्थान करती है। मेलाभाटा पहुँचने से पूर्व माँ दंतेश्वरी मंदिर के कपाट खोले जाते हैं।
पूरे वर्ष बंद रहने वाले इस मंदिर के दर्शन इसी अवसर पर आम श्रद्धालुओं को प्राप्त होते हैं। राजपरिवार, मंदिर के पुजारी एवं देवी-देवताओं की मौजूदगी में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पुजारियों के अनुसार यह परंपरा रियासत काल से चली आ रही है, जिसमें क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है। मंदिर पूजा के बाद मेलाभाटा में मेला खंभे की पूजा राजपरिवार द्वारा की जाती है। इसके पश्चात देवी-देवताओं की टोली राजपरिवार के सदस्यों के साथ पूरे मेला परिसर की ढाई परिक्रमा करती है।
इस रस्म के साथ ही मेले का औपचारिक शुभारंभ होता है और लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं। इस वर्ष मेले की रौनक उस समय और बढ़ गई जब कांकेर लोकसभा सांसद भोजराज नाग भी देवी-देवताओं की टोली के साथ शामिल हुए। बाजे-गाजे की धुन पर सांसद को थिरकते देख श्रद्धालुओं और दर्शकों में विशेष उत्साह देखने को मिला। उत्तर बस्तर कांकेर का यह ऐतिहासिक मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की संस्कृति, सभ्यता और अनूठी परंपराओं का प्रतीक है, जिसे देखने देश-विदेश से लोग यहाँ पहुँचते हैं।
