माय फर्स्ट राइड: लाइफ में रिटेक नहीं होता

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Published By Anjali Singh
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मेरी नई-नई शादी हुई थी, मैं अपने ससुराल में थी जबकि मेरे पति विमल उन दिनों ट्रेनिंग में लखनऊ थे। मैंने अपने ससुर जी से कार चलाना सीखने की इच्छा जाहिर की, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और कहा कि ये स्किल तो तुम्हें आनी ही चाहिए। मेरा लर्निंग लाइसेंस बनवाया गया और पास के एक मोटर ड्राइविंग स्कूल में मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई। जल्दी ही स्टियरिंग पर कमांड होने लगा, क्लच छोड़ने की कला में भी अगले एक सप्ताह में निपुण हो गई। हालांकि ड्राइविंग स्कूल के ट्रैनर बहुत डांटते थे, मुझे बड़ा गुस्सा भी आता था, लेकिन जैसे-तैसे मैं ड्राइविंग ट्रेनिंग करती रही, दूसरे सप्ताह में ही मुझे आत्मविश्वास होने लगा कि अब मैं बिना ट्रेनर के कार चला सकती हूं। गीतिका जोशी पांडेय, खंड शिक्षा अधिकारी, रामगढ़ नैनीताल

फिर मेरे पहले ड्राइव का दिन आ गया, मैं अपने पति के साथ अपनी मम्मी से मिलने निकली, उस समय हमारे पास एक मारुति 800 कार हुआ करती थी। मैंने इच्छा जाहिर की औऱ ड्राइविंग सीट में बैठ गई, बगल में विमल बैठे थे, मैंने सीट बेल्ट लगाई, क्यों कि सेफ्टी सबसे पहले है, फिर रियर व्यू अपने हिसाब से सेट किया। सीट एडजस्टमेंट किया। दरअसल ये ट्रेनिंग में मुझे सिखाया गया था कि कार आगे बढ़ने से पहले ही ये सारे एडजस्टमेंट कर लेने चाहिए। चलती गाड़ी में सीट एडजस्टमेंट खतरनाक हो सकता है।

क्लच छोड़ा और कार आगे बढ़ने लगी, मेरे पति थोड़ा घबरा रहे थे, बार बार ‘अरे धीरे, आराम से, देख कर’ जैसी उनकी कॉमेंट्री चलती रही, लेकिन थोड़ी ही देर में वो रिलैक्स हो गए। कहने लगे कि हां तुम सीख गई हो। मेरा ससुराल हल्द्वानी में नवाबी रोड में और मायका कटघरिया में है। करीब 6 या 7 किलोमीटर की ड्राइव रही थी, जब मैं अपने मायके पहुंचने ही वाली थी, तो सामने से एक ट्रक को बचाते हुए निकलने में कुछ मिस कैल्कुलेशन हुआ औऱ गांव की सड़क के किनारे बने गड्ढा में अगला बायां पहिया चला गया। विमल मुझे डांटते हुए बोले, “मैं कह रहा था किनारे ही रोक लो।”

खैर! ड्राइविंग सीट बदली गई, हस्बैंड ड्राइविंग सीट पर आए। गड्ढे में फंसी कार को निकालने की कोशिश की गई, लेकिन कार गड्ढे में और फंसती गई। मैं बहुत नर्वस ओर शर्मिंदा महसूस कर रही थी। गांव के लोगो ने मुझे पहचान लिया। अरे ये तो आशु की बहन है, क्या हुआ , कैसे हुआ? थोड़ी देर में मेरा भाई ट्रैक्टर लेकर आया।

रस्सी से खींचकर जैसे- तैसे कार बाहर निकली। हम घर पहुंचे, मेरा आत्मविश्वास बिखर गया था। मैंने कहा कि अब मैं गाड़ी नहीं चलाऊंगी। विमल ने मुझे समझाया कि “नहीं तुमने सिचुएशन को अच्छे से डील किया था। ट्रक से बचते हुए तुम निकल गई थीं, लेकिन आगे से ध्यान रखो कि ड्राइविंग के दौरान ऐसे मौके आएं तो खुद को किनारे रोक लो,चांस मत लो। लाइफ में रिटेक नही होता है।”

बस टैब से ड्राइविंग में ये फार्मूला मैंने सीख लिया कि चांस मत लो, क्योंकि लाइफ में रिटेक नही होता है। लौटते में विमल ने कहा कि कार तुम ही चलाओगी। मैंने अपने आत्मविश्वास को बटोरा ड्राइविंग सीट पर बैठी और मैं एक अच्छी ड्राइवर बन गई।

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