घर-घर के सपनों और संघर्षों की कहानी था ‘हम लोग’ दिन जो याद आते हैं
भारत का पहला टीवी धारावाहिक ‘हम लोग’ दूरदर्शन पर 7 जुलाई 1984 से रात नौ बजे प्रसारित होना शुरू हुआ था। इस अकेले धारावाहिक की लोकप्रियता ने टीवी को घर-घर पहुंचाने में बड़ा योगदान दिया। हफ्ते में एक दिन आने वाले 20 वीं सदी के इस धारावाहिक की यादें आज सीनियर सिटीजन हो चुके लोगों के जेहन में न सिर्फ ताजा हैं, बल्कि किरदार उनके दिलों में जीवंत हैं। यह वह दौर था, जब परिवार ही नहीं आस-पड़ोस के लोगों के साथ या टेलीविजन नहीं होने पर दूसरों के घर जाकर सीरियल या फिल्म देखने का मजा लिया जाता था। -मनोज त्रिपाठी, कानपुर।
‘हम लोग’ में आठ सदस्यों वाले एक उत्तर भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार की ऐसी कहानी थी, जिसमें सभी का अलग-अलग व्यक्तित्व था। उनकी जिंदगी, तकलीफों, सपनों, मुश्किलों और कुंठाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ एक छत के नीचे पिरोया गया था। यही वजह थी कि इसके पात्र जैसे शराबी पिता बसेसर राम, मंझली, बड़की, छुटकी और नन्हें न सिर्फ उस समय हर घर की पहचान बन गए थे, बल्कि दर्शक उनसे खुद को या अपने आसपास के लोगों से जुड़ा हुआ महसूस करते थे। इन सभी ने मिलकर एक ऐसे परिवार की रचना कर दी थी कि जिसे आज भी लोग याद करते हैं। धारावाहिक में विनोद नागपाल- (बसेसरराम-पिता), जयश्री अरोड़ा (भागवंती-मां), (सुषमा सेठ-इमरती-दादी), लाहिरी सिंह- दादाजी, राजेश पुरी-लल्लू, सीमा पाहवा-बड़की, दिव्या सेठ -छुटकी तथा लवलीन मिश्रा ने मंझली और अभिनव चतुर्वेदी ने नन्हें का अभिनय किया था।
देश का पहला सोप ओपेरा
‘हम लोग’ को भारतीय टेलीविजन इतिहास का पहला सोप ओपेरा माना जाता है। यह एक मेक्सिकन टेलीविजन सीरीज वेन कोनमिगो से प्रेरित था, जिसे शिक्षा और मनोरंजन पर बनाया गया था। बताते हैं ‘हम लोग’ का आइडिया तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वसंत साठे को आया था, जो 1982 में मेक्सिको के दौरे से लौटे थे। इसी के बाद मनोहर श्याम जोशी ने इस धारावाहिक की कहानी लिखी, जिसे निर्देशक पी. कुमार वासुदेव के सहयोग से विकसित किया गया।
154 एपिसोड, 17 महीने से ज्यादा प्रसारण
‘हम लोग’ धारावाहिक 17 महीनों से ज्यादा चला और खत्म होने के साथ सबसे लंबे समय तक चलने वाला टीवी सीरियल बन गया था। इसके कुल 154 एपिसोड प्रसारित किए गए थे। एक एपिसोड 25 मिनट का होता था, लेकिन आखिरी एपिसोड, जिसे 17 दिसंबर 1985 को प्रसारित किया गया, वह 55 मिनट का था।
दादा मुनि अंत में आते और छा जाते
‘हम लोग’ के हर धारावाहिक के अंत में प्रसिद्ध अभिनेता दादा मुनि अशोक कुमार आकर कहानी का सार देने के साथ अपने अलग ही अंदाज में समाज पर कटाक्ष करते हुए सार्थक संदेश देते थे, जिसे दर्शक बेहद पसंद करते थे। इसके चलते ही उन्हें धारावाहिक के दौरान चार लाख से अधिक पत्र मिले थे।
समाज सुधार के लिए जागरूकता
इस धारावाहिक का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ परिवार नियोजन और सामाजिक सुधारों के प्रति जागरूकता फैलाना था। इसमें शराबखोरी, लैंगिक भेदभाव, गरीबी, अंधविश्वास और करियर की संभावनाओं जैसे मुद्दों को बड़ी संवेदनशीलता के साथ उठाया गया था।
हिमाचल भवन में रिहर्सल, गुड़गांव में शूटिंग
धारावाहिक की शूटिंग गुड़गांव (अब गुरुग्राम) में की जाती थी, जबकि रिहर्सल दिल्ली में मंडी हाउस के पास हिमाचल भवन में होती थी। इसके किरदार शूटिंग पर जाने से पहले यहां रिहर्सल करते फिर वैन में बैठकर गुड़गांव जाते थे।
और कहानी के अंत में...
दादीजी कैंसर से हार गए, लेकिन उन्होंने अपनी अधूरी तीर्थयात्रा पर जाने का फैसला किया। बसेसर राम सुधर गए। एक सुखद मोड़ पर, उन्होंने परिवार के मुखिया की भूमिका संभाली। भगवंती आज्ञाकारी पत्नी ही रहीं, लेकिन अब वह कम आहें भरती थीं और ज्यादा बोलती थीं। मंझली न तो नायिका बन पाईं और न ही गायिका, लेकिन उन्हें इंस्पेक्टर सामदार से प्यार हो गया। बड़की को दमदार आवाज वाले डॉ. अश्विनी के साथ सितारों के नीचे अपना पल मिला। लालू अपने नाम के अनुरूप ही रहे, लेकिन उन्होंने नौकरी का सपना छोड़ दिया। उनकी गरिमापूर्ण और सुशिक्षित पत्नी उषा रानी उनके साथ खड़ी रहीं। नन्हें ‘गावस्कर’ तो नहीं बन पाए, लेकिन कामिया के साथ, उन्होंने वास्तविक दुनिया में अपनी जगह बनाई। छुटकी डॉक्टर बनने के लिए घर से निकल गई।
