समानता के लिए समाधान टकराव नहीं, संतुलन में है

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Published By Anjali Singh
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महाविद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के कैंपस में इस समय माहौल यूजीसी रेगुलेशन-2026 को लेकर चर्चा, बहस और पक्ष-विपक्ष के बीच बंटा हुआ नजर आ रहा है। कहा जा रहा है कि यूजीसी के नए विनियमों से उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी बनाम जनरल कैटेगरी के बीच भेदभाव और बढ़ेगा और इन विनियम का दुरुपयोग एडमिशन, नियुक्ति, प्रमोशन हर जगह होगा।

इसका दुष्परिणाम यह होगा कि छात्र-छात्रों के बीच जातीय संघर्ष बढ़ने से आपसी समरसता और खत्म हो जाएगी। इसके चलते इन विनियम की सार्थकता जितनी व्यावहारिक रूप से सहज दिख रही है, वास्तविकता से ये उतने ही दूर हैं। इसी तर्क के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके UGC विनियम, 2026 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। 
  
याचिका में कहा गया है कि नए नियम यूजीसी के समानता नियम के सेक्शन 3(C) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और यूजीसी अधिनियम 1956 के भी विरुद्ध है। इससे उच्च शिक्षा में समान अवसर देने के अवसर खत्म होंगे। सोशल मीडिया पर भी इस विनियम का भारी विरोध हो रहा है। इस सबके बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा न केवल प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का हथियार भी है। यदि उच्च शिक्षण संस्थान अलगाववादी बने रहेंगे, तो वे राष्ट्र निर्माण का अपना मुख्य उद्देश्य कैसे पूरा कर पाएंगे। ऐसे में देश को ‘शिक्षा के अधिकार’ से ‘समान शिक्षा के अधिकार’ की तरफ आगे बढ़ना जरूरी है और यह तभी संभव है, जब कैंपस के भीतर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को हतोत्साहित करने के साथ दंडित करने का प्रावधान सुनिश्चित किया जाए। - मनोज त्रिपाठी, कानपुर

इन कारणों से अस्तित्व में आए नए नियम 

यूजीसी के अनुसार नए नियमों की जरूरत उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी और अनुसूचित जाति-जनजातियों के विरुद्ध बढ़ते भेदभाव के मामले रोकने और उन पर निगरानी रखने के लिए बनाए गए हैं। 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई थी। इसके अलावा इस नियम को बनाने के पीछे रोहित वेमुला और पायल ताडवी जैसे मामलों में की गई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां भी हैं। दरअसल जनवरी 2016 में तेलंगाना में रोहित वेमुला और मई 2019 में पायल ताडवी की आत्महत्या के मामलों के बाद पीड़ित परिजनों ने 29 अगस्त 2019 को सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके जातीय भेदभाव की शिकायतों पर कठोर नियम बनाने की मांग की थी। 

जस्टिस सूर्यकांत मिश्रा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यूजीसी को जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर डेटा जुटाने और नए नियम बनाने का निर्देश जनवरी 2025 में दिया था। इसी के बाद फरवरी 2025 में नए नियमों से संबंधित ड्राफ्ट जारी किया गया था। यह भी कहा जा रहा है कि ये विनियम उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानूनी और संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ करते हैं तथा वर्ष 2019 में आईआईटी दिल्ली के अध्ययन में उठाई गईं उन गंभीर चिंता को संबोधित करते हैं, जिनमें पाया गया था कि ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75 फीसदी छात्र परिसर में भेदभाव का सामना करते हैं।

नए विनियम में यह हैं प्रावधान   

नए विनियमों में जाति आधारित भेदभाव की व्यापक व्याख्या की गई है। जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विरुद्ध किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके साथ ही भेदभाव को किसी भी अनुचित, पक्षपाती या भिन्न व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष और यह जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या विकलांगता जैसे आधारों पर लागू होता है। इसमें ऐसे कृत्य भी शामिल हैं, जो शिक्षा में समानता के अधिकार को बाधित करें या मानव गरिमा का उल्लंघन करें। 

प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान के लिए समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य समता, सामाजिक समावेशन एवं समान पहुंच को बढ़ावा देना तथा परिसरों में भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समाधान करना है।

प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना है। 

समान अवसर केंद्र (EOC) के अंतर्गत संस्थान में एक समता कमेटी गठित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। इस कमेटी में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा, ताकि समावेशी निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सके। शिकायत मिलते ही समिति बैठक करेगी और रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को देगी।

हर संस्थान को 24 घंटे की इक्विटी हेल्पलाइन चलानी होगी। शिकायतकर्ता की पहचान मांगने पर गोपनीय रखी जाएगी।

समान अवसर केंद्र को अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जबकि समानता कमेटी को वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करनी होगी। हर संस्थान को समान अवसर केंद्र की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को प्रस्तुत करनी होगी। 

नए विनियमों में भेदभाव उन्मूलन और समानता संवर्द्धन की स्पष्ट जिम्मेदारी संस्थानों को निर्दिष्ट की गई है तथा संस्थान के प्रमुख को प्रभावी कार्यान्वयन और अनुपालन के लिए सीधे उत्तरदायी बनाया गया है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)  राष्ट्रीय स्तर पर एक निगरानी समिति बनाएगा, जिसमें वैधानिक पेशेवर परिषदों व आयोगों के प्रतिनिधि तथा नागरिक समाज के सदस्य शामिल होंगे। यह समिति कम से कम वर्ष में दो बार बैठक करके नियमों के क्रियान्वयन की समीक्षा करेगी, भेदभाव के मामलों की जांच करेगी और रोकथाम के उपाय सुझाएगी। 

नवीन नियमावली में संस्थानों को भेदभाव समाप्त करने, समानता को बढ़ावा देने और इसके लिए उपयुक्त उपाय करने के उत्तरदायित्व दिए गए हैं। संस्थान के प्रमुख को यह सुनिश्चित करने का पूर्ण अधिकार और जिम्मेदारी होगी कि नियमों का पालन हो।

नियमों का अनुपालन न होने पर क्या होगा

उच्च शिक्षा संस्थानों को यूजीसी की योजनाओं में भाग लेने से वंचित किया जा सकता है। उन्हें डिग्री कार्यक्रम, डिस्टेंस लर्निंग एवं ऑनलाइन कार्यक्रम संचालित करने से रोका जा सकता है।  अनुदान रोका जा सकता है, नए कोर्स बंद हो सकते हैं। संस्थान को उच्च शिक्षा संस्थानों की सूची से हटाया जा सकता है। इससे ये नियम सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय बन गए हैं।

कौन से हैं वह मुख्य बिंदु, जिन पर जताई जा रही है आपत्ति

पिछले साल फरवरी माह में यूजीसी ने इन नियमों का मसौदा (ड्राफ्ट) संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखा गया था, लेकिन अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने ओबीसी को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया है। मसौदा नियमों में भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट थी, जिसे अब विस्तारित करते हुए कहा गया है कि जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर कोई अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार, जो शिक्षा में समानता को लेकर बाधा डालता है या मानव की गरिमा का उल्लंघन करता है, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा। इसी तरह मसौदा नियमों में यह प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को ‘हतोत्साहित’ किया जाएगा और इसके लिए जुर्माना या सस्पेंड करने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन अधिसूचित नियमों में झूठी शिकायतों से संबंधित प्रावधान हटा दिया है।

 

 

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