भस्म की होली पर काशी में बढ़ा विरोध: मचा घमासान, जानिए विद्वानों की राय और इसकी पौराणिक मान्यता

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Published By Anjali Singh
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वाराणसी। धार्मिक नगरी काशी में मणिकर्णिका घाट पर आयोजित होने वाली 'चिता भस्म की होली' विवादों में घिर गई है। 28 फरवरी को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर प्रस्तावित इस आयोजन का काशी विद्वत परिषद, अखिल भारतीय संत समिति तथा विभिन्न विद्वानों ने कड़ा विरोध किया है।

विद्वानों ने जताया विरोध 

विद्वानों का कहना है कि श्मशान घाट पर उत्सव मनाना, हुड़दंग करना तथा तेज आवाज में गीत-संगीत बजाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। चिता भस्म होली के आयोजक गुलशन कपूर ने दावा किया कि यह काशी की प्राचीन परंपरा है। उनका कहना है कि विरोध करने वाले लोग विद्वान नहीं हैं।

शमशान में खेली जाती है भस्म की होली

मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ और मां गौरा के साथ काशीवासी तथा देश-विदेश के लोग होली खेलते हैं, लेकिन बाबा के प्रिय गण भूत, प्रेत, पिशाच सामान्य मनुष्यों के साथ होली नहीं खेल सकते। 

प्राचीन मान्यता अनुसार क्या है महत्त्व 

प्राचीन मान्यता है कि एकादशी के दूसरे दिन, द्वितीया तिथि को बाबा अपने प्रिय गणों के साथ श्मशान घाट पर चिता भस्म की होली खेलते हैं। सोशल मीडिया के कारण 'मसान की होली' विश्वविख्यात हो गई है और देश-विदेश से लोग इसे देखने आते हैं। आयोजक का आरोप है कि इसी कारण कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। 

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री प्रो. विनय पांडेय ने बताया कि 'मसान की होली' कुछ वर्षों से काशी में देखने को मिल रही है, जो बिल्कुल शास्त्र-सम्मत नहीं है। यह सनातन परंपरा को विकृत कर रही है तथा समाज में विकृतियां पैदा कर रही है। काशी विद्वत परिषद इसका पुरजोर विरोध करता है। 

उन्होंने कहा, "श्मशान की अपनी मर्यादा है, यह किसी उत्सव का स्थल नहीं है। मसान होली के नाम पर हुड़दंग करना कहीं से उचित नहीं। डीजे की धुन पर नृत्य करना श्मशान में शोभनीय है क्या। क्या शिव का सामर्थ्य किसी के अंदर है। यह पूर्णतः अशास्त्रीय उपक्रम है।"

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मसान की होली अब एक इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा बन गई है। नशे में धुत लोग हुड़दंग करते हैं। यह कैसी परंपरा है, जिस परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा हो, आँखों में आंसू हों, जिसने अपने परिजन को खोया हो, उसके सामने मसान होली के नाम पर हुड़दंग करना कतई उचित नहीं।" उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने इसे महज एक इवेंट बना दिया है। अखिल भारतीय संत समिति इसकी घोर निंदा करती है और इसका पुरजोर विरोध करती है। 

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