सुलतानपुर : नवरात्र के पहले दिन उमड़ी भक्तों की भीड़, लोगों की आस्था का केंद्र बना प्राचीन दुर्गा मंदिर 

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Published By Anjali Singh
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सुलतानपुर। उत्तर-प्रदेश के सुलतानपुर जिले में लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर शहर से सटे लोहरामऊ स्थित दुर्गा मंदिर पर नवरात्र के पहले दिन गुरुवार को भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह छह बजे से ही भक्त मंदिर में पहुंचने लगे समय बढ़ाने के साथ भक्तों की भीड़ बढ़ाने लगी। अब नवरात्र भर यहां मेला लगेगा। सुलतानपुर जिले में देवी दुर्गा का एक ही मंदिर है जिसकी वृहद मान्यता हैं। नवरात्र भर भक्त परिवार संग माँ दुर्गा के दर्शन कर उपासना करेंगे और माता दुर्गा से मन्नते मांगेंगे। 

बताया जाता है कि प्राचीन परंपरा के अनुसार यहाँ जो भक्त कराही (पूड़ी लपसी का चढ़ावा) देता है उसकी मान्यता देवी मां अवश्य पूरा करती हैं। जिस भक्त की मान्यता पूरी हो जाती है और मान्यता के अनुसार लोग अपने बच्चों का मुंडन कराते हैं तो यही चढ़ावा चढ़ते हैं।

ज्ञात हो कि गुरुवार से नवरात्रि का महापर्व शुरू हो गया। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की घर घर पूजा की गई। इसी दिन घट स्थापना कर मां दुर्गा को घर में स्थापित किया गया। नवदुर्गाओं में प्रथम देवी शैलपुत्री अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण करती है, जो भगवान शिव का भी अस्त्र है। 

देवी शैलपुत्री का त्रिशूल जहां पापियों का विनाश करता है, वहीं भक्तों को अभयदान का देती हैं। उनके बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है, जो अविचल ज्ञान और शांति का प्रतीक है। भगवान शिव की भांति देवी शैलपत्री का वाहन भी वृषभ (बैल) है। शहर से सटे लोहरामऊ स्थित दुर्गामाता का मंदिर अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह प्राचीन मंदिर वर्षों वर्ष से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। 

मान्यता है कि यहां भक्तों पर मां भगवती की विशेष कृपा बरसती है। आम समय में यहां शुक्रवार और सोमवार को भक्तों की भीड़ होती है। लेकिन नवरात्रि पर यहां महोत्सव जैसा माहौल हो जाता है। लाखों लाख भक्त परिवार सहित माता भवानी के दर्शन को आते हैं। आम दर्शन में आने वाले भक्त नारियल चुनरी, मीठा फल का प्रसाद ही चढ़ाते हैं। लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर शहर से पांच किमी दूर लोहरामऊ बाजार है। 

बाजार से दक्षिण की तरफ करीब चार सौ मीटर दक्षिण अंदर लोहरामऊ दुर्गा माता का धाम के नाम से जाना जाने वाला दुर्गा माता की प्राचीन मूर्ति आलौकित छटा के साथ स्थापित है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर लोग एक मत नहीं है। अंग्रेजों के जमाने के 1905 का एक दस्तावेज मिलता है, जिसमें मंदिर के लिए पांच बीघा जमीन को देने का उल्लेख किया गया है। हालांकि मौजूदा समय में मंदिर के पास उतनी भूमि नहीं है। मंदिर की स्थापना को लेकर भी स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिलते। गांव के कुछ बुजुर्ग कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में भदैंया की रानी ने यहां कुंआ और मंदिर का निर्माण कराया था। 

मंदिर को समय-समय पर नए स्वरूप में परिर्वतित किया गया। 1983 में गर्भगृह में स्थित मंदिर का जीर्णोद्धार तत्कालीन पुजारी पंडित सरजू प्रसाद मिश्र ने अपने सहयोगी लालता प्रसाद तिवारी के साथ मिलकर कराया था। इसके बाद 1992 में नए मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। तब से उसी मंदिर में नित नए आयाम बनते जा रहे हैं। 

दुर्गा माता की मंदिर परिसर में उनके अलावा माता संतोषी, भगवान भोलेनाथ,राधा कृष्ण, श्रीराम जानकी और बजरंगबली का पूरब मुख मूर्ति स्थापित है। नवरात्र में भक्तों की भीड़ को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था भी की गई हैं। इस दौरान देहात कोतवाली की ओर से आधा दर्जन से अधिक महिला पुरुष सिपाहियों सहित दरोगा की ड्यूटी लगी है। वीआईपी राजनीतिक नेताओं के अलावा प्रशासनिक व न्यायिक अधिकारी भी परिवार के साथ अपने कल्याणार्थ दर्शन को आते हैं। 

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