रोजगार का सवाल
भारत में आर्थिक हालात हर दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हैं। देश में लॉकडाउन के दौरान अनुमानित 14 करोड़ लोगों ने रोजगार खो दिया जबकि कई अन्य लोगों के लिए वेतन में कटौती की गई थी। रोजगार के क्षेत्र में चाहे भाजपा की सरकारें हों या कांग्रेस की या अन्य पार्टियों की, सभी का रवैया लगभग एक …
भारत में आर्थिक हालात हर दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हैं। देश में लॉकडाउन के दौरान अनुमानित 14 करोड़ लोगों ने रोजगार खो दिया जबकि कई अन्य लोगों के लिए वेतन में कटौती की गई थी। रोजगार के क्षेत्र में चाहे भाजपा की सरकारें हों या कांग्रेस की या अन्य पार्टियों की, सभी का रवैया लगभग एक जैसा है। वे धीमे-धीमे इस क्षेत्र से हाथ खींच रही हैं।
वर्तमान में केंद्र सरकार के विभागों में 20 लाख से ज्यादा और राज्य सरकारों में 50 लाख से ज्यादा पद खाली हैं। केंद्र सरकार का दावा है कि देश में नौकरियों की कमी नहीं है, लेकिन लोग स्थाई और सरकारी ही नौकरी चाहते हैं। संगठित क्षेत्र में हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा हुए हैं। जानकारों के मुताबिक भारत दुनिया के उन देशों में है जहां औसत के लिहाज से सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम है। यदि अमेरिका की तुलना में देखें तो प्रति एक लाख आबादी पर देश में एक चौथाई से भी कम कर्मचारी काम करते हैं।
चीन की तुलना में भी भारत में सरकारी कार्मिकों की संख्या आधे से कम है और वैश्विक स्तर पर भी भारत बहुत पीछे है। यह बात भी कही जाती है कि जब मेडिकल, शिक्षा, सुरक्षा, परिवहन, नागरिक आपूर्ति आदि विभागों में संख्या से कम कार्मिक होंगे तो वहां भ्रष्टाचार बढ़ेगा ही। रोजगार के लिहाज से बीते दो साल भारत के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहे हैं। तमाम तरह की सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टों में यह बताया गया कि केवल केंद्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों के स्तर पर भी रोजगार उपलब्ध कराने की गति बेहद धीमी रही है।
मौजूदा कोरोना काल में भारत सरकार ने 20 लाख करोड़ से अधिक का पैकेज घोषित किया। इस पैकेज से कंपनियों के खजाने भरे, लेकिन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के पास भी शायद ही ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध हो जिससे पता चल सके कि 20 लाख करोड़ खर्च करने के बाद वास्तव में कितने लोगों को रोजगार मिल पाया।
राजनीतिक मुद्दों पर हम लोग इतने भावुक हो जाते हैं कि रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य आपूर्ति, आवास आदि के प्रश्न गौण हो जाते हैं। जाहिर है, यह अच्छी स्थिति नहीं है। सरकारों को ये भी बताना चाहिए कि इस हालत को बदलने का उसके पास क्या कार्यक्रम है। रोजगार का प्रश्न सिर्फ चुनावी विषय नहीं होना चाहिए।
