रिश्तों में बढ़तीं दरारें... उत्तर भारत में क्यों बढ़ रही है घरेलू हिंसा?
डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, डेक्स न्यूजः घरेलू हिंसा भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या है और उत्तर भारत में इसके अपेक्षाकृत अधिक मामलों की चर्चा अक्सर होती रही है। यह केवल किसी एक कारण से नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारकों के जटिल मिश्रण का परिणाम है। आखिर क्या कारण है कि उत्तर भारत में घरेलू हिंसा अधिक क्यों दिखाई देती है और इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हैं।
पितृसत्तात्मक समाज की गहरी जड़ें
उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में समाज की संरचना पितृसत्तात्मक है, जहां पुरुष को परिवार का मुखिया और निर्णयकर्ता माना जाता है। इस व्यवस्था में महिलाओं को अक्सर अधीनस्थ भूमिका में रखा जाता है। जब पुरुष अपने अधिकार को चुनौती महसूस करता है या किसी कारणवश तनाव में होता है, तो वह हिंसा के माध्यम से अपनी “सत्ता” स्थापित करने की कोशिश करता है। यह मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जिससे घरेलू हिंसा को कई बार सामान्य व्यवहार मान लिया जाता है।
शिक्षा और जागरूकता की कमी
हालांकि शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है, फिर भी उत्तर भारत के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है।
शिक्षा की कमी के कारण
n महिलाएं प्राय: अपने अधिकारों से अनजान रहती हैं।
n वे हिंसा को सहन करने को मजबूरी समझती हैं।
n कानूनी सहायता लेने में हिचकिचाती हैं।
n इसके विपरीत, जहां शिक्षा और जागरूकता अधिक होती है, वहां महिलाएं अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में सक्षम होती हैं।
दहेज प्रथा और विवाह से जुड़ी समस्याएं
उत्तर भारत में दहेज प्रथा अभी भी एक गंभीर समस्या है। दहेज को लेकर विवाह के बाद महिला पर अतिरिक्त दबाव डाला जाता है। कम दहेज लाने पर उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। कई मामलों में यह हिंसा गंभीर रूप भी ले लेती है, यह समस्या सामाजिक प्रतिष्ठा और लालच दोनों से जुड़ी है, जो घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है।
n सामाजिक मान्यताएं और ‘इज्जत’ का दबाव- उत्तर भारतीय समाज में परिवार की ‘इज्जत’ को बहुत महत्व दिया जाता है। इसी कारण महिलाएं अपने साथ हो रही हिंसा को छुपाती हैं, परिवार और समाज उन्हें चुप रहने की सलाह देते हैं, तलाक या अलगाव को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है, इस सामाजिक दबाव के कारण महिलाएं वर्षों तक हिंसा सहती रहती हैं, जिससे यह समस्या और गहरी होती जाती है।
n शराब और नशे की लत- कई मामलों में घरेलू हिंसा का सीधा संबंध शराब और अन्य नशे की लत से होता है। उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में पुरुषों में शराब सेवन की प्रवृत्ति अधिक है और नशे की हालत में नियंत्रण कम हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर भी हिंसा की घटनाएं बढ़ जाती हैं, यह एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
n कानून का कमजोर क्रियान्वयन- भारत में घरेलू हिंसा के खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं, जैसे कि ‘घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005’। लेकिन उत्तर भारत में कई बार पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में कठिनाई होती है। सामाजिक दबाव के कारण मामले दबा दिए जाते हैं। न्याय प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है। इससे अपराधियों में डर कम हो जाता है और वे अपने व्यवहार को जारी
रखते हैं।
n पारिवारिक संरचना और संयुक्त परिवार का दबाव- उत्तर भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली अभी भी प्रचलित है। इसमें सास-ससुर और अन्य सदस्यों का हस्तक्षेप अधिक होता है। बहू पर अपेक्षाओं का दबाव बढ़ जाता है। कई बार परिवार के अन्य सदस्य भी हिंसा को बढ़ावा देते हैं। इससे महिला के लिए स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि वह केवल पति ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के दबाव में होती है।
n मानसिक स्वास्थ्य और गुस्से का प्रबंधन- कई बार घरेलू हिंसा का कारण मानसिक तनाव, अवसाद या गुस्से को सही तरीके से न संभाल पाना भी होता है। उत्तर भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता कम है, जिसके कारण
लोग अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त नहीं कर पाते। गुस्सा हिंसा के रूप में बाहर आता है। यह एक छिपा हुआ, लेकिन महत्वपूर्ण कारण है।
पारंपरिक सोच
अब भी कई जगह यह माना जाता है कि महिला का मुख्य काम घर संभालना है।
अगर महिला:
n नौकरी करना चाहती है।
n अपनी राय रखना चाहती है।
n स्वतंत्र निर्णय लेना चाहती है, तो इसे परिवार की “परंपरा” के खिलाफ माना जाता है, जिससे टकराव और हिंसा की स्थिति बन सकती है। उत्तर भारत में घरेलू हिंसा की अधिकता किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। पितृसत्तात्मक सोच, शिक्षा की कमी, आर्थिक निर्भरता, दहेज प्रथा, सामाजिक दबाव और कानून के कमजोर क्रियान्वयन जैसे कारण इस समस्या को जटिल बनाते हैं।
समस्या का समाधान
n महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया जाए।
n समाज में जागरूकता फैलाई जाए।
n कानूनों का सख्ती से पालन कराया जाए।
n मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग पर ध्यान दिया जाए।
n पुरुषों की सोच में सकारात्मक बदलाव
लाया जाए।
n घरेलू हिंसाकेवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब तक समाज मिलकर इस समस्या का समाधान नहीं खोजेगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।
