देखें Inspirational Short Stories... शक्ति का दंभ और बालश्रम की सच्ची आवाज
शक्ति-दंभ ... सुधाकर आशावादी
वह स्वयं को शक्तिमान से कम नहीं समझता था। उसे अपनी शक्ति पर गर्व था, सो जिसे भी अपने से कमजोर समझता, उसका अपमान करता, जिसे चाहता उसे धमकाता। कोई उससे उलझने की हिम्मत न कर पाता। एक दिवस वह अपने घर के पास चहलकदमी कर रहा था कि सामने से एक लड़का आता दिखाई दिया। उसने उसे कमजोर समझकर पकड़ लिया तथा उस पर धौंस जमाने लगा। जैसे-तैसे वह लड़का उसकी पकड़ से बाहर हुआ और अपनी राह पकड़ी। शक्तिमान को अपनी शक्ति पर पुनः गर्व हुआ। कुछ ही दिन बीते होंगे। वह अपनी गली में साइकिल चला रहा था। उसने देखा कि वही लड़का आ रहा है, जिसे उसने धौंस देकर धमकाया था। उसने अपनी साइकिल उस लड़के के सम्मुख अड़ा दी और बोला- “तूने मेरे इलाके से गुजरने की हिम्मत कैसे की?”
लड़के ने हिम्मत दिखाई, पहले तो उसकी साइकिल का हैंडिल पकड़ कर उसे गिराया, फिर उसको धकियाते हुए बोला-“आज तेरी पूरी दादागिरी निकालता हूं।” उसने उसके गालों पर थप्पड़ों की बौछार कर दी। इतने पर भी वह शांत नहीं हुआ, उसने उसकी साइकिल के दोनों पहियों की हवा निकाल दी। उसने कल्पना तक न की थी कि उसे इस प्रकार से उत्तर भी मिल सकता है। उससे कोई प्रतिरोध करते न बना। वह चुप था और शर्मसार भी।
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किस्सा... लाइक- कमेंट
राजेश ओझा
प्रीतम भाई आज जब सुबह वाक पर निकले तभी एक लघुकथा मस्तिष्क में हिट करने लगी। उसे बुनने में वे इतने मग्न हो गए कि लौटने का ध्यान ही नहीं रहा। अचानक एक ठोकर से वे वर्तमान में आए। देखा आज काफी लंबा निकल आए थे। वहीं से वापस हो लिए। लौटते वक्त तक समय हो चला था। सड़क की पटरियों पर चाय की भट्टियों से अब धुंआ उठने लगा था। दैनिक मजदूर काम धंधे के वास्ते मजदूर-मंडी की तरफ जा रहे थे। सूनी सड़कों पर चहलकदमी फिर से शुरू हो गई थी।
प्रीतम बाबू घर की तरफ चले जा रहे थे। नित्य इस समय तक घर पर चाय पी लेते थे। समय होने पर चाय की तलब जग उठी। तभी देखा सड़क-किनारे एक टपरी पर कुछ नगरपालिका स्तर के लोग अपनी पहली चाय के साथ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर विमर्श कर रहे हैं। प्रीतम जी मुस्काए और चाय वाले से एक कुल्हड़ चाय का आर्डर करके एक बगल खड़े हो गए। अभी वे खड़े ही हुए थे कि पीछे से आवाज आई- “भई प्रधानमंत्री जी का तो जलवा है। भारत दिनों-दिन तरक्की पर है। सुना है हम अब दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था हैं।“
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“गलत नहीं सुना है आपने। हमारी शिक्षा-व्यवस्था अब इतनी सुदृढ़ है कि अब हम पुनः नालंदा और तक्षशिला का इतिहास दोहरा सकते हैं।” “सही है भई और सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम अपने अधिकार और हक के लिए लड़ सकते हैं अब।” तभी एक बारह-चौदह वर्ष के बच्चे ने इस सर्द सुबह में स्वयं ठिठुरते हुए प्रीतम जी को गर्म चाय का कुल्हड़ पकड़ाया।
प्रीतम जी अनायस पूछ बैठे- “बेटा! क्या नाम है तुम्हारा?”
“सूरज।”
“कितने वर्ष के हो?”
“पता नहीं।”
“स्कूल जाते हो?”
“नहीं।”
“मां-बाप कहां हैं तुम्हारे?” कहते हुए प्रीतम जी ने मोबाइल का कैमरा आन किया था।
बच्चा बुरा सा मुंह बनाकर बोला-“देखिए अंकल लाइक-कमेंट की हवस में आप मुझे फेसबुक पर दरिद्र बनाकर प्रस्तुत करोगे और वाह वाही लूटोगे। चुपचाप चाय पियो, पैसे दो और निकल लो। बालश्रमिकों पर संवेदना प्रकट करने यहां एक दो रोज आते हैं। प्रधानमंत्री जी का खुफिया-तंत्र अब इतना भी लचर नहीं है, लेकिन उनके पास देश के और तमाम बड़े काम हैं।” प्रीतम जी पीने कदमों से अब अपने घर की तरफ जा रहे थे।
