बंगाल हिंसा : राजनीतिक वर्चस्व और लोकतंत्र की दुर्दशा

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Published By Deepak Mishra
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बंगाल हिंसा ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने संकट खड़ा कर दिया है। शांति के लिए आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल संयम बरतें और अपने कार्यकर्ताओं को कानून के दायरे में रहने के लिए प्रेरित करें।

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विवेक सक्सेना, अयोध्या

 

भारत, जिस देश के राष्ट्रपिता ने पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया, आज उसी देश के राज्य पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक तनाव और हिंसक झड़पें अब सामान्य बात बन गई हैं, जो लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राज्य में हिंसा और तनाव काफी बढ़ गया है। आसनसोल, कूच बिहार और न्यू टाउन सहित कई इलाकों से आगजनी, झड़प और तोड़फोड़ की खबरें आने लगीं।

अब तक 200 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं, 433 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 1100 से अधिक एहतियाती हिरासत में लिए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ने मुख्य सचिव, डीजीपी और सीएपीएफ को ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं, हिंसा रोकने के लिए संयुक्त पुलिस-सीएपीएफ नियंत्रण कक्ष बनाए गए हैं। वहीं टीएमसी और भाजपा दोनों एक-दूसरे पर हिंसा का आरोप लगा रहे हैं।

आलम ये है कि पश्चिम बंगाल, चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान तो हिंसा से बच गया, लेकिन चुनाव बाद हिंसा से नहीं बच पाया। जिस तरह की हिंसा हुई है, उससे पिछले विधानसभा चुनावों के बाद की भयावह तस्वीर सामने आ जाती हैं। ममता ने यह कहकर एक तरह से अपने समर्थकों को उकसाया है कि वे हारी नहीं, बल्कि उन्हें हराया गया है, इसलिए वे त्यागपत्र नहीं देंगी। इससे साफ होता है कि वे चुनाव बाद हिंसा भड़काने के आरोपों से बच नहीं सकतीं। समर्थक आतंकित करने वाली हिंसा का जो परिचय दे रहे हैं, वह उस हिंसक राजनीतिक संस्कृति की देन है, जिसे ममता ने 15 वर्षों में उसी तरह संरक्षित किया। 

बंगाल में आतंक मचा रहे हिंसक तत्व कितने अधिक दुःसाहसी हैं, इसका खौफनाक प्रमाण है मुख्यमंत्री बन चुके सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हत्या। बंगाल में हिंसक घटनाओं की ममता ने कभी परवाह नहीं की। हालिया घटनाओं, विशेष रूप से मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा और वक्फ संशोधन के मुद्दे पर तनाव, यह दर्शाता है कि राज्य में सांप्रदायिक विभाजन गहरा रहा है। आलोचकों का मानना है कि ममता बनर्जी सरकार की तुष्टीकरण की नीति ने स्थिति को और खराब किया है, जिससे कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा मिला है। 

ममता बनर्जी अक्सर हिंसा के लिए ‘बाहरी लोगों’ को जिम्मेदार ठहराती रही हैं, लेकिन पुलिस की रिपोर्ट और स्थानीय लोगों के बयानों में विरोधाभास उनके दावों पर सवालिया निशान लगाता है। इतना ही नहीं कलकत्ता उच्च न्यायालय को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा है, जिसमें मुर्शिदाबाद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती के आदेश शामिल हैं। यह राज्य पुलिस की निष्पक्षता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की क्षमता पर गंभीर सवाल उठाता है। 

राज्य में सांप्रदायिक रूप से सरगर्म जुलूसों और पुलिस की कथित निष्क्रियता ने तनाव को और भड़काया है। बंगाल में राजनीतिक और सामुदायिक हिंसा का इतिहास दशकों पुराना है। समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के शासन के दौरान चुनावी और सामाजिक तनाव की खबरें सामने आती रही हैं। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, चाहे वह किसी भी पक्ष द्वारा की जाए। विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के बीच बढ़ता टकराव अक्सर धरातल पर कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों का रूप ले लेता है, जो अंततः सामान्य नागरिकों और राज्य की शांति को प्रभावित करता है। 

इस्तीफा न देने की जिद पर अड़ीं ममता और उनकी राज्य विधानसभा को गुरुवार को राज्यपाल आरएन रवि ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया। अब शासन को यह देखना होगा कि मौजूदा हिंसा पर कैसे लगाम लगे। वैसे तो चुनाव बाद 60 दिनों तक केंद्रीय बलों को बनाए रखने का फैसला लिया गया था, पर शायद उनकी तैनाती और बढ़ानी पड़े। जो भी हो, भाजपा को यह समझना होगा कि उसके सामने अन्य अनेक चुनौतियों के साथ कानून एवं व्यवस्था के मोर्चे को मजबूत करना और पूरी तरह ठीक करने की गंभीर चुनौती है। उसे इस चुनौती का सामना करना ही होगा, क्योंकि इससे ही राज्य को पटरी पर लाया जा सकता है। 

पश्चिम बंगाल में शांति की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल संयम बरतें और अपने कार्यकर्ताओं को कानून के दायरे में रहने के लिए प्रेरित करें। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन इसमें केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय भी अनिवार्य है। विकास और सुशासन के एजेंडे को सांप्रदायिक या राजनीतिक ध्रुवीकरण से ऊपर रखना होगा। जब तक राजनीति में हिंसा को एक हथियार के रूप में देखा जाएगा, तब तक लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती रहेंगी। स्थायी समाधान के लिए निष्पक्ष जांच, त्वरित न्याय और समावेशी संवाद की आवश्यकता है, ताकि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रखा जा सके।

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