संपादकीय:सोनार बांग्ला की चुनौतियां

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Published By Monis Khan
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पश्चिम बंगाल में भाजपा का सतासीन होना, भारतीय राजनीति के सबसे बड़े सत्ता परिवर्तनों में से एक माना जाएगा। भारतीय जनसंघ के संस्थापक के गृह राज्य में भाजपा को अपने लगभग 46 वर्ष के राजनीतिक इतिहास में पहली बार सत्ता मिली है। बंगाल लंबे समय तक वैचारिक और राजनीतिक रूप से वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा। ऐसे में यह जीत सरकार बदलने के साथ राजनीतिक मानस बदलने की भी प्रतीक है। 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ऐसे बंगाल की कल्पना की थी, जो सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी, आर्थिक रूप से समृद्ध और राष्ट्रीय दृष्टि से मजबूत हो, किंतु स्वतंत्रता के बाद बंगाल लगातार औद्योगिक पलायन, राजनीतिक हिंसा, श्रमिक असंतोष और प्रशासनिक जड़ता से जूझता रहा। अब भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘सोनार बांग्ला’ के अपने वादे को पूरा करना है। 
राज्य और केंद्र में एक ही दल की सरकार होने का लाभ बंगाल को मिलेगा। आधारभूत ढांचे, रेल, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, रक्षा कॉरिडोर और निवेश परियोजनाओं में केंद्र-राज्य समन्वय तेज होगा। 

नई सरकार के मुख्यमंत्री के सामने भ्रष्टाचार-मुक्त और पारदर्शी प्रशासन का दावा साबित करना बड़ी चुनौती होगी। मुख्यमंत्री के ऊपर नारदा स्टिंग और शारदा चिट फंड प्रकरणों का राजनीतिक विवादों तथा प्रधानमंत्री द्वारा वर्षों पहले उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों का साया इस काम में उनकी नैतिक विश्वसनीयता परखेगा। आर्थिक मोर्चे पर बंगाल की स्थिति जटिल है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से पीछे रही है और उद्योगों का पलायन चितनीय है। रोजगार सृजन के लिए निवेश चाहिए, लेकिन निवेश के लिए भूमि, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक भरोसा आवश्यक है। 

सिंगूर और नंदीग्राम की स्मृतियां अभी भी उद्योग जगत को याद हैं। यदि भाजपा सरकार सचमुच औद्योगिक पुनरुत्थान चाहती है, तो उसे पारदर्शी डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, विवाद-मुक्त भूमि अधिग्रहण और श्रम-प्रशासन में स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी। बंगाल की स्वाभाविक ताकतें स्पष्ट हैं— कोलकाता पोर्ट आधारित लॉजिस्टिक्स, चाय उद्योग, पेट्रोकेमिकल, चमड़ा, समुद्री व्यापार, एमएसएमई, आईटी सेवाएं और पूर्वोत्तर तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए व्यापारिक द्वार के रूप में इसकी स्थिति। 

यदि सरकार निवेशकों को भरोसा दे सके, तो राज्य नई औद्योगिक छलांग लगा सकता है, हालांकि सबसे संवेदनशील प्रश्न सामाजिक सौहार्द का है। भाजपा ने चुनाव में ‘घुसपैठ’ को बड़ा मुद्दा बनाया, लेकिन बिना ठोस आंकड़ों और कानूनी प्रक्रिया के इस मुद्दे पर कठोर कार्रवाई सामाजिक तनाव और भारत-बांग्लादेश संबंधों दोनों को प्रभावित कर सकती है। बंगाल जैसे बहुधार्मिक और सीमावर्ती राज्य में प्रशासनिक संतुलन अत्यंत आवश्यक होगा। अंततः बंगाल की जनता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति परिवर्तन चाहती है। 

भाजपा के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक तथ्य यह है कि हार के बावजूद तृणमूल कांग्रेस का वोट आधार लगभग 40 प्रतिशत अभी भी बना हुआ है। इसका अर्थ है कि बंगाल पूरी तरह वैचारिक रूप से भाजपा के पक्ष में नहीं गया है। यदि नई सरकार अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो सत्ता परिवर्तन संभव हो सकता है। यदि नई सरकार हिंसा, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पक्षपात से ऊपर उठकर सुशासन दे सकी, तभी ‘सोनार बांग्ला’ का सपना विश्वसनीय लगेगा। उम्मीद है कि यह नई सरकार बंगाल के सपने को हर हाल में पूरा करेगी।