खंडहर हो गया कुरु वंश का राजमहल
महाभारत कालीन हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश में बिजनौर और मेरठ जिले की सीमा पर स्थित है। पांडवों और कौरवों का बचपन हस्तिनापुर के राजमहल में बीता, इसलिए हस्तिनापुर महाभारत में घटित होने वाली कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। आज दूर-दूर से पर्यटक इस प्राचीन ऐतिहासिक नगर को देखने आते हैं। समय के थपेड़ों से कुरु वंश का राजमहल आज खंडहरों में तब्दील हो गया है। अब यह महल पांडव टीला के नाम से जाना जाता है। हस्तिनापुर में कई दर्शनीय स्थल और मंदिर हैं।
हस्तिनापुर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर वर्तमान समय में बहसूमापुर रियासत स्थित है। महाभारत में बहसूमापुर पांडव और कौरवों के पितामह भीष्म की जन्म स्थली है। पितामह भीष्म आज भी वहां के जनमानस में बड़े आदर और श्रद्धा के पात्र हैं। महाभारत की कई सारी घटनाएं हस्तिनापुर में हुई। हस्तिनापुर कुरु वंश की राजधानी थी। महाभारत हस्तिनापुर में ही एक तरह से शुरू हुआ था। यहीं कौरवों और पांडवों का मिलन हुआ था। हस्तिनापुर की कहानी की शुरुआत में कुंती, पांच पांडव और ऋषि सोलह साल बाद हस्तिनापुर लौटे थे।
पांडवों के पिता पांडु को श्राप मिला हुआ था कि यदि वह कभी भी सहवास की इच्छा से अपनी पत्नियों के पास जाएंगे, तो उनकी मृत्यु हो जाएगी, इसलिए पांडु ने यह व्यवस्था की थी कि उनकी पत्नियां दूसरे तरीकों से संतान पैदा करें। सोलह सालों तक वह अपनी पत्नियों से दूर, ऋषि-मुनियों की संगत में रहे। उन्होंने ज्ञान अर्जित किया, ब्रह्मचर्य की साधना की और एक शक्तिशाली प्राणी बन गए। एक दिन जब वह वन में एक निर्जन नदी के पास पहुंचे, तो उनकी दूसरी पत्नी माद्री उसी समय स्नान करके पानी से बाहर निकली। उसे निर्वस्त्र देखकर पांडु के अंदर कामना ने इतना जोर मारा कि इतने सालों के बाद वह खुद पर से नियंत्रण खो बैठे और माद्री के पास चले गए।
माद्री श्राप के बारे में जानती थी, इसलिए उसने काफी विरोध किया। मगर किस्मत पांडु को माद्री की ओर खींचती रही और आखिरकार उन्होंने माद्री की बाहों में दम तोड़ दिया। माद्री भय से चिल्लाने लगी। वह सिर्फ पति की मृत्यु से नहीं बल्कि इस बात से भी आतंकित थी कि उसके लिए पांडु की कामना ने उन्हें मार डाला था। उसके चिल्लाने की आवाज पर कुंती उस ओर भागीं और वस्तुस्थिति को देखकर वह गुस्से से भर गईं। दोनों पत्नियों के बीच इतने सालों से दबी भावनाएं अचानक उभर आईं।
थोड़ी देर बाद, अपने बच्चों के बारे में सोचकर कुंती शांत हो गईं। अपराधबोध और निराशा से भरी माद्री ने पति के साथ चिता में जलने का फैसला किया। कुंती दिल ही दिल में ठंडे दिमाग से एक दृढ निश्चय कर चुकी थी। उसने निर्ममता से वह किया जो एक रानी के रूप में उसे करना चाहिए था। फिर ऋषियों के साथ, कुंती और पांचों पांडव लगभग सोलह साल बाद हस्तिनापुर की ओर चल पड़े। पांडवों और कुंती का स्वागत किया गया। पांडु का अंतिम संस्कार किया गया। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
