'यूनिवर्सिटी है, स्कूल नहीं!' लखनऊ विश्वविद्यालय में ड्रेस कोड के खिलाफ सड़क पर लेटे छात्र, कुलपति और प्रशासन के खिलाफ फूटा छात्रों का गुस्सा
लखनऊ: लखनऊ विश्वविद्यालय (LU) परिसर एक बार फिर राजनीति और विरोध का अखाड़ा बन गया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा नए शैक्षणिक सत्र से अनिवार्य किए गए ड्रेस कोड के खिलाफ विद्यार्थियों ने मोर्चा खोल दिया है। छात्रों का आरोप है कि नियमों की आड़ में संस्थान उनका मानसिक उत्पीड़न कर रहा है। विरोध इस कदर बढ़ा कि उग्र छात्रों ने छात्र भवन चौराहे को पूरी तरह जाम कर दिया और विश्वविद्यालय प्रबंधन के खिलाफ तीखी नारेबाजी की।
सड़क पर लेटकर जताया विरोध, पुलिस ने खदेड़ा
प्रदर्शन को अनोखा और आक्रामक रूप देते हुए दर्जनों छात्र मुख्य सड़क पर लेट गए और आवागमन ठप कर दिया। 'विश्वविद्यालय प्रशासन की तानाशाही' और 'तानाशाही नहीं चलेगी' के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। सड़क जाम होने और हंगामे की स्थिति को देखते हुए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। प्रदर्शनकारियों को समझाने का प्रयास जब विफल रहा, तो पुलिस ने सड़क पर लेटे छात्रों को जबरन उठाकर वहां से हटाया और हिरासत में ले लिया।
शायराना अंदाज में बगावत का बिगुल
इस आंदोलन के दौरान छात्रों के तेवर बेहद तल्ख नजर आए। अपनी आवाज बुलंद करते हुए एक प्रदर्शनकारी छात्र ने मशहूर शेर पढ़ते हुए कहा कि "उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरूरी है, जो जिंदा हैं, वो जिंदा नजर आना भी जरूरी है।"
छात्रों ने स्पष्ट किया कि वे अपने अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे।
"गवर्नर की मनमर्जी बर्दाश्त नहीं"
आंदोलन की अगुवाई कर रहे छात्र नेताओं का सीधा निशाना उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल पर था। छात्रों का तर्क है कि राजभवन की ओर से विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में ड्रेस कोड थोपने का फैसला पूरी तरह तर्कहीन है। छात्रों ने कहा, "यह तानाशाही रवैया है, जिसे छात्र समुदाय कभी स्वीकार नहीं करेगा।" इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने राज्यपाल को संबोधित एक मांगपत्र (ज्ञापन) भी प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा।
यूनिवर्सिटी और स्कूल के अंतर पर उठे सवाल
प्रदर्शन में शामिल छात्र अमितेश पाल ने शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी खामियों को उजागर करते हुए कहा कि गवर्नर महोदया का यह कदम पूरी तरह अव्यावहारिक है।
अमितेश ने सवाल उठाया कि अगर शासन वाकई समानता लाना चाहता है, तो शिक्षा के स्तर और संसाधनों में समानता क्यों नहीं लाता? देश के सामाजिक और शैक्षणिक ढांचे में इतनी असमानताएं हैं, उन्हें दूर करने के बजाय कपड़ों पर ध्यान दिया जा रहा है। एक बच्चा पहली से बारहवीं कक्षा तक यूनिफॉर्म में ही रहता है। क्या हम ताउम्र सिर्फ स्कूल ड्रेस ही पहनते रहेंगे? कॉलेज और यूनिवर्सिटी वैचारिक स्वतंत्रता की जगह हैं, इन्हें स्कूल न बनाया जाए।"
यूनिवर्सिटी कैंपस में इस गतिरोध के बाद तनाव का माहौल बना हुआ है, वहीं छात्र संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन और उग्र होगा।
