प्रसंगवश : ऊर्जा संकट, पर्यावरण और साइकिल की सवारी

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Published By Deepak Mishra
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साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एक समय सामाजिक समानता और सादगी का प्रतीक भी

एक समय था, जब साइकिल भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। आधुनिकता की दौड़ में मोटर वाहनों की चमक-दमक के बीच साइकिल धीरे-धीरे सड़कों से हाशिये पर चली गई।

siddharth
कुमार सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार

 

हर वर्ष 3 जून को ‘विश्व साइकिल दिवस’ मनाया जाता है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने इस दिवस को इसलिए मान्यता दी, ताकि दुनिया को यह याद दिलाया जा सके कि साइकिल केवल दोपहियों वाला साधारण वाहन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक बचत और टिकाऊ विकास का प्रभावी साधन है। आज जब दुनिया पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब साइकिल फिर से चर्चा के केंद्र में आ गई है।

एक समय था, जब साइकिल भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। आधुनिकता की दौड़ में मोटर वाहनों की चमक-दमक के बीच साइकिल धीरे-धीरे सड़कों से हाशिये पर चली गई। अब दुनिया फिर समझ रही है कि विकास का अर्थ केवल तेज रफ्तार वाहन नहीं, बल्कि ऐसे साधन भी हैं, जो टिकाऊ हों और समाज के लिए लाभकारी हों।

आज जब पर्यावरण संरक्षण और ‘ग्रीन मोबिलिटी’ की बात होती है, तो इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी तकनीक, चार्जिंग स्टेशन और नई परिवहन योजनाओं की खूब चर्चा होती है। सरकारें इलेक्ट्रिक कारों और दो पहिया वाहनों को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना रही हैं। शहरों में चार्जिंग प्वाइंट स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन अफसोस है कि इन चर्चाओं के बीच पर्यावरण-अनुकूल साधन, पारंपरिक ‘साइकिल’ अक्सर गायब हो जाती है।

साइकिल ऐसा वाहन है, जिसे न पेट्रोल चाहिए, न डीजल, न बैटरी और न ही कोई चार्जिंग-स्टेशन। यह पूरी तरह मानव ऊर्जा पर आधारित है। इसके बावजूद शहरी परिवहन योजनाओं में इसे वह प्राथमिकता नहीं मिलती, जिसकी यह हकदार है। कई शहरों में ‘साइकिल लेन’ की योजनाएं बनीं, लेकिन अनेक जगहों पर वे अतिक्रमण, खराब डिजाइन और उपेक्षा के कारण सफल नहीं हो सकीं।

साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एक समय सामाजिक समानता और सादगी का प्रतीक भी रही है। एक दौर में शिक्षक, विद्यार्थी, कर्मचारी, किसान और छोटे अधिकारी सभी साइकिल से यात्रा करते थे। इसमें वर्ग भेद कम दिखाई देता था। यही कारण है कि कई विचारकों ने साइकिल को लोकतांत्रिक वाहन कहा।

वर्ष 1960 के बाद जैसे-जैसे मोटर वाहनों की संख्या बढ़ी, साइकिल पीछे छूटने लगी। कारें और बड़े वाहन आधुनिकता और उपभोक्तावाद के प्रतीक बन गए। धीरे-धीरे साइकिल को पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि सड़कों पर कारों का कब्जा बढ़ता गया और साइकिल हाशिये पर चली गई। आज फिर परिस्थितियां बदल रही हैं। दुनिया समझ रही है कि महंगे ईंधन, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु संकट के दौर में साइकिल पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि समझदारी और टिकाऊ जीवन शैली का प्रतीक है।

भारत आज भी दुनिया के बड़े साइकिल उपयोग करने वाले देशों में शामिल है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश में दस से 12 करोड़ से अधिक परिवारों के पास साइकिल उपलब्ध है। ग्रामीण भारत में इसका उपयोग और भी अधिक है। साइकिल उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल एक करोड़ से अधिक नई साइकिलों की बिक्री होती है। पंजाब का लुधियाना देश के साइकिल निर्माण का बड़ा केंद्र माना जाता है। भारत दुनिया के बड़े साइकिल उत्पादक देशों में भी शामिल है।

दुनियाभर में साइकिल की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व में एक अरब से अधिक साइकिलें उपयोग में हैं। यूरोप, चीन, जापान और एशिया के कई देशों में साइकिल रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। कई देशों में लाखों लोग प्रतिदिन साइकिल से अपने कार्यस्थल पहुंचते हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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