सोशल फोरम : गामा पहलवान और बिड़ला

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Published By Deepak Mishra
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गामा ने कहा था कि काश हमारा जिस्म और बड़ा होता तो उसकी नाप के कपड़े बड़े होते...

22 मई उनका जन्मदिन था और 23 मई को गामा ने दुनिया को अलविदा कहा था। मुझे जहां तक याद है, ज़्यादातर पुराने घरों में कभी न कभी गामा का नाम आया होगा।

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हाफिज किदवई, ब्लॉगर

 

बचपन में गामा पहलवान हमारे लिए एक क़िस्सा भर थे। गामा पहलवान हमारे यहां मुहावरे की तरह इस्तेमाल होते। जैसे माइकल जैक्सन, हिटलर यह नाम से ज़्यादा मुहावरे हो चुके थे। किसी को थिरकते देखा तो कहा, बहुत माइकल जैक्सन मत बनो, किसी को हुक्म चलाते देखा, तो कहा हिटलर हो गए हो क्या, वैसे ही कोई ताक़त दिखाता तो उसे हम लोग कह देते, देखो बड़े गामा बन रहे हैं।

गामा हमारी ज़ुबानों पर थे, बिना यह जाने की वह हैं क्या, मुझे कुश्ती नहीं पसंद मगर यह याद है, जब नानी अम्मी ने कहा की गामा ने बंटवारे के वक़्त खुद पाकिस्तान में खड़े होकर बहुत से हिंदुओं की जान बचाई और अपने खर्चे से हिंदुस्तान भेजा। यहां तक एक परिवार के लिए अपनी कुश्ती का सामान गिरवी रख दिया। अपनी चादरें घर बार छोड़कर जाने वाली औरतों को ओढ़ने को दे दी। 

गामा ने कहा था कि काश हमारा जिस्म और बड़ा होता तो उसकी नाप के कपड़े बड़े होते, जो ज़्यादा लोगों के काम आते। अपने घर का अनाज तक जाने वालों को देकर खुद हफ़्तों कुछ नहीं खाया। महीनो दिन रात अपनी गली की रखवाली करता रहा यह दुनिया का मशहूर पहलवान गामा।

गामा ने कह रखा था कि उसकी गली के हिंदुओं को कोई हाथ भी लगाएगा तो उसे गामा से भिड़ना होगा। गामा महीनों अपनी गली की रखवाली करते रहे, दुनिया का मशहूर पहलवान अपनी गली में दंगाइयों से हिफाज़त करने को रात रात जागता रहता। यह किस्से सुनकर गामा के लिए दिलचस्पी पैदा हुई। वो गामा की इसलिए इज़्ज़त करती थीं कि वो पहलवान होकर भी बड़े नरम दिल के थे।

22 मई उनका जन्मदिन था और 23 मई को गामा ने दुनिया को अलविदा कहा था। मुझे जहां तक याद है, ज़्यादातर पुराने घरों में कभी न कभी गामा का नाम आया होगा। गामा ज़िंदगी में कभी नहीं हारे। उनकी ज़िन्दगी के बहुत से किस्से सुने, जो अभी वैसे ही याद हैं। उनको क्या लिखें, सिवाए इसके कि आपकी प्रतिभा का क्षेत्र कोई भी हो, अगर उसमें मोहब्बत और नरमी उतर आए तो आप दुनिया के दिलों पर राज करेंगे।

गामा का आखिरी वक़्त ग़ुरबत में बीता। भारतीय उद्योगपति बिड़ला ने उनकी मासिक पेंशन बांध दी। यह भी देखिये की वह वक़्त कैसा था। अच्छे लोग अच्छे लोगों की मदद करने में सरहद का रोने नहीं रखते थे। दुश्मन की नज़र से नहीं देखते थे। जो अच्छा है, वह सबका है, जो बुरा है, वह सिर्फ अपनी भीड़ का है। (फेसबुक वॉल से)

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