UP में सुस्ती पर हाईकोर्ट सख्त: कहा- 'अफसरों की गलती पर उन पर दर्ज हो केस, CM योगी खुद देखें यह फैसला'

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Published By Muskan Dixit
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प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि अब समय आ गया है कि वरिष्ठ नौकरशाहों और शीर्ष प्रशासनिक प्रमुखों को उनके विभागों या अधीनस्थों की खामियों के लिए जवाबदेह और यहां तक कि आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जाए। अदालत ने मुख्य सचिव को इस निर्णय की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को उनके व्यक्तिगत अध्ययन और अदालत की चिंताओं पर उचित विचार के लिए उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया। 

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि राज्य सरकार को ''श्रेष्ठ जिम्मेदारी का सिद्धांत'' अपनाना होगा जिसके तहत एक प्रशासनिक पदानुक्रम में वरिष्ठ अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाता है। अदालत ने तीन जून को अवनीश कुमार अग्रवाल की याचिका स्वीकार करते हुए कहा, वरिष्ठ अधिकारियों को आचरण और निष्पादन के लिए जवाबदेह ठहराना आवश्यक है क्योंकि लोक सेवाओं को प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराना उनकी पेशेवर और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। 

18 साल बाद चार्जशीट पर भड़का इलाहाबाद हाईकोर्ट

याचिकाकर्ता ने बरेली की एक विशेष अदालत द्वारा पारित आदेश को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी। बरेली की अदालत ने याचिकाकर्ता के पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता के मुताबिक, उनके खिलाफ दो आपराधिक मामलों की वजह से उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया गया। एक मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़ा था। एक मामले में जांच करीब दो दशकों तक लंबित रही, जबकि दूसरे मामले में आरोप पत्र 18 वर्षों के विलंब के बाद 2024 में दाखिल की गई। 

अदालत ने मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में 2023 के आदेश का हवाला देते हुए राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों में सरकारी विभागों द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकियों की जांच की निगरानी के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के उद्देश्य से एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति गठित करने का निर्देश दिया था। उस मामले में खंठपीठ ने निर्देश दिया था कि जांच तेजी से चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाए। 

वरिष्ठ नौकरशाहों पर तय हो आपराधिक जिम्मेदारी

अदालत को अवगत कराया गया कि 2023 के निर्णय के अनुपालन में उच्च अधिकार प्राप्त समिति का गठन दिसंबर, 2025 में किया गया और वह भी तब जब अदालत ने मौजूदा मामले को संज्ञान में लिया। इस पर अदालत ने कहा कि न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन में एक महत्वपूर्ण बाधा नौकरशाहों के कुछ वर्गों की मानसिकता में निहित है जिनका दृष्टिकोण ''समावेशी नहीं'' है और जो विवेकाधीन अधिकार को बनाए रखने को ''अपने आप में एक लक्ष्य'' मानते हैं। 

अदालत ने कहा कि इस ''विवेकाधीन अधिकार के खत्म होने की आशंका'', लोक प्रशासन में लाल फीताशाही का मुख्य कारक है। पीठ ने इस मामले में अपना निर्णय तीन महीने पहले सुरक्षित रख लिया था और उच्च अधिकार प्राप्त समिति द्वारा निर्णय की प्रगति पर अद्यतन जानकारी के लिए प्रतीक्षा की, लेकिन निर्णय सुनाए जाने तक कोई सूचना नहीं प्राप्त हुई। 

इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए पीठ ने अपर शासकीय अधिवक्ता को याद दिलाया कि मुख्य सचिव, राज्य प्रशासन की आधारशिला होते हैं जिसके लिए उनका प्रतिनिधित्व करने वालों से असाधारण सतर्कता की अपेक्षा की जाती है। 

इसके साथ पीठ ने निबंधक (अनुपालन) को इस निर्णय की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव के पास इस निर्देश के साथ भेजने को कहा कि उच्च अधिकार प्राप्त समिति की कार्यवाही समयबद्ध एवं प्रभावी तरीके से संपन्न कराई जाए। अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, बरेली को निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक याचिकाकर्ता के पक्ष में पासपोर्ट का नवीनीकरण करने का निर्देश दिया।

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