जॉब का पहला दिन : चिकित्सा पेशा नहीं, सेवा का संकल्प

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Published By Anjali Singh
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जीवन में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो हमारे मस्तिष्क पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं। मेरे लिए ऐसा ही दिन वह था, जब मैंने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) सोहावल, अयोध्या में चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला। वर्षों की कड़ी मेहनत और चिकित्सा की जटिलताएं सीखने के बाद, यह वह बहुप्रतीक्षित क्षण था, जब मैं सीधे समाज की सेवा करने जा रहा था। इस नई शुरुआत को लेकर मैं बेहद उत्साहित था, इसी कारण कार्यालय समय से एक घंटे पहले, सुबह 7 बजे ही अस्पताल पहुंच गया। प्रभु श्रीराम की पावन भूमि अयोध्या से अपनी सेवा शुरू करना अत्यंत गर्व और जिम्मेदारी का विषय था।

 सेवाकाल की पहली सुबह, घबराहट और उत्साह का अनोखा मिश्रण भीतर घुमड़ रहा था। जब मैंने अपनी सफेद एप्रन पहनी और स्टेथॉस्कोप को गले में डाला, तो जिम्मेदारी का गहराई से एहसास हुआ। सोहावल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में प्रवेश करते ही मैंने देखा कि कुछ मरीज पहले से ही ओपीडी के बाहर कतारों में इंतजार कर रहे थे। सबसे पहले, मैंने वहां के वरिष्ठ स्टाफ, फार्मासिस्ट, एएनएम और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों से मुलाकात की। सभी का व्यवहार बहुत ही सहयोगी और आत्मीय था। अस्पताल प्रभारी ने मुझे मेरा केबिन दिखाया और केंद्र की कार्यप्रणाली से अवगत कराया।

जैसे ही मैं अपनी कुर्सी पर बैठा, मरीजों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। ग्रामीण क्षेत्रों में एक मेडिकल ऑफिसर केवल एक डॉक्टर नहीं होता, बल्कि वह मरीजों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण होता है। मेरा पहला मरीज एक बुजुर्ग व्यक्ति था, जो लंबे समय से खांसी और जोड़ों के दर्द से परेशान था। जब मैंने उनकी नब्ज जांची और पूरी तसल्ली से उनकी बात सुनी, तो उनके चेहरे पर जो संतोष का भाव था, उसने मेरा आत्मविश्वास दोगुना कर दिया। दिन ढलने के साथ-साथ मौसमी बुखार, त्वचा के संक्रमण से लेकर गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और बच्चों के टीकाकरण जैसे कई मामले सामने आए।

ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र में काम करने की सबसे बड़ी चुनौती सीमित संसाधनों के साथ सर्वश्रेष्ठ इलाज देने की थी। ऐसे में मुझे समझ आया कि यहां केवल किताबी ज्ञान काम नहीं आएगा, बल्कि व्यावहारिक सूझबूझ और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण है। दोपहर के समय एक इमरजेंसी केस  आया।  एक किसान को खेत में काम करते समय चोट लग गई थी। घाव गहरा था और खून बह रहा था। मैंने तुरंत स्टाफ की मदद से घाव साफ किया, टांके लगाकर प्राथमिक उपचार दिया। उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि एक चिकित्सा अधिकारी के रूप में मेरा हर त्वरित निर्णय किसी के जीवन को दर्द से राहत दे सकता है।

 शाम को ओपीडी समाप्त होने पर मैंने पूरे अस्पताल परिसर का निरीक्षण किया और दवाओं के स्टॉक की जानकारी ली। इसी दौरान यह बात समझ में आई कि चिकित्सा अधिकारी के रूप में मेरा काम सिर्फ मरीजों को देखना ही नहीं, बल्कि चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की सरकारी योजनाओं को हर गरीब तक पहुंचाना भी है। जब मैं शाम को पीएचसी से घर के लिए निकला, तो शारीरिक रूप से थके होने के बावजूद मन असीम संतुष्टि से भरा था। पहला दिन मुझे यह सिखा गया था कि चिकित्सा का पेशा सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का पवित्र संकल्प है। 


-डॉ. आरपी मिश्रा, एसीएमओ, कानपुर नगर