सामयिकी : ‘कॉकरोच’ आंदोलन की दशा, दिशा और प्रभाव

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Published By Deepak Mishra
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दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन तो हो गया, लेकिन इस प्रदर्शन के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि कॉकरोच जनता पार्टी की आगे की रणनीति क्या होगी? सोशल मीडिया पर जिस अनुपात में कॉकरोच जनता पार्टी को समर्थन मिला था

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रोहित कौशिक, स्वतंत्र पत्रकार

 

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन तो हो गया, लेकिन इस प्रदर्शन के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि कॉकरोच जनता पार्टी की आगे की रणनीति क्या होगी? सोशल मीडिया पर जिस अनुपात में कॉकरोच जनता पार्टी को समर्थन मिला था, उस अनुपात में इस प्रदर्शन में भीड़ नहीं जुट पाई, हालांकि व्यवस्था से नाराज युवाओं के साथ काफी संख्या में यूट्यूबर्स भी आए हुए थे। वामपंथी पार्टियों के छात्र विंग के युवा भी वहां पहुंचे। अगले शनिवार को फिर इकट्ठा होने का वायदा कर इस प्रदर्शन को खत्म कर दिया गया। 

कॉकरोच जनता पार्टी से शिक्षा व्यवस्था से नाराज युवाओं और अन्य लोगों का भावानत्मक जुड़ाव है, लेकिन क्या कोई भी आंदोलन सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव से सफल हो सकता है? किसी भी आंदोलन को आगे बढ़ाने और उसके उद्देश्य तक पहुंचाने के लिए एक स्पष्ट रणनीति और स्पष्ट वैचारिकी होनी चाहिए? अभी तो कॉकरोच जनता पार्टी के पास उस स्पष्ट रणनीति और वैचारिकी का अभाव नजर आ रहा है। सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना बन पाएगी?

कोई भी आंदोलन बिना समर्पण, त्याग और तप के न तो खड़ा किया जा सकता है और न ही लंबा चल सकता है। सोशल मीडिया पर टिप्पणी करना एक बात है और किसी आंदोलन में लगातार भाग लेना और पसीना बहाना दूसरी बात है। सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे कोई भी आंदोलन नहीं चल सकता है। यही कारण है जिस जोश और अनुपात में सोशल मीडिया पर युवा इस आंदोलन से जुड़े उस अनुपात में जंतर-मंतर पर इकट्ठा नहीं हो सके। जंतर-मंतर पर भीड़ जरूर जुटी, लेकिन उस भीड़ को भी संख्या के हिसाब से बहुत सकारात्मक नहीं कहा जा सकता। अभिजीत दीपके और उनके तीन प्रवक्ता तीन बजे प्रदर्शन स्थल से चले गए और वहां आए युवा स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते रहे। 

नीट तथा अन्य परीक्षाओं में हुई अनियमिताओं से युवा वर्ग निराश है। इस पूरी व्यवस्था से युवाओं में गुस्सा है, लेकिन सिर्फ नाराज होने और उस नाराजगी को प्रदर्शित करने से ही कोई भी व्यवस्था बदलती नहीं है। जरूरत होता है एक लंबे समय तक सही दिशा में चलने की। क्या यह आंदोलन भी सही दिशा में चल पाएगा या फिर यह आंदोलन कुछ लोगों द्वारा कब्जा लिया जाएगा। कभी-कभी इस तरह के आंदोलन एक फर्जी हलचल पैदा करते हैं।

अन्ना आंदोलन का हाल हम सबने देखा है। उस समय अन्ना हजारे को आज के गांधी की संज्ञा दी जाने लगी थी। बाद में अन्ना आंदोलन को दिशा देने वाले लोगों ने अपने स्वार्थ साधने शुरू कर दिए, इसलिए जो आंदोलन हमें ऊपर से बहुत ईमानदार दिखाई देते है, कई बार वे आंदोलन उतने ईमानदार नहीं होते। यह बात कहकर मैं इस आंदोलन के पीछे की भावना पर सवाल नहीं उठा रहा हूं। हो सकता है कि इस आंदोलन की भावना सही हो, लेकिन क्या आगे भी इस आंदोलन की भावना सही और ईमानदार रह पाएगी। इस समय तो इस आंदोलन में किसी स्पष्ट वैचारिकी का अभाव दिखाई दे रहा है। 

क्या यह आंदोलन अपनी कोई स्पष्ट वैचारिकी विकसित कर पाएगा? कई बार गुस्से में कुछ सतही चीजें पैदा हो जाती हैं। यह आंदोलन सतही है या नहीं, अभी यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तो तय है कि यदि यह आंदोलन सही दिशा में नहीं चल पाया तो यह आंदोलन निश्चित रूप से सतही ही साबित होगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं)    

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