संपादकीय : कीर्तिमान से आगे

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Published By Pradeep Kumar
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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नेतृत्व की निरंतरता स्वयं में एक राजनीतिक घटना होती है। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू के लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ना मात्र व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और नेतृत्व के प्रति जनविश्वास का भी संकेत है। 146 करोड़ की आबादी, असाधारण भाषाई-सांस्कृतिक विविधता और महाद्वीपीय आकार वाले देश में इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक जनादेश प्राप्त करना निःसंदेह एक उल्लेखनीय राजनीतिक उपलब्धि है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक अस्थिरता सामान्य बात है। ऐसे समय में भारत में एक नेता का लगातार तीन आम चुनावों में केंद्रीय भूमिका निभाना इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग के साथ स्थायी राजनीतिक संवाद स्थापित किया है। यह केवल संगठन की ताकत नहीं, बल्कि नेतृत्व की स्वीकार्यता का भी संकेत है। 

30 से अधिक देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित होना, अनेक देशों की संसदों को संबोधित करना और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति को अधिक प्रभावशाली बनाना उनकी बड़ी उपलब्धियों में गिना जाएगा। आज भारत केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि जी-20, क्वाड, ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में स्थापित हुआ है। घरेलू मोर्चे पर भी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, डिजिटल भुगतान क्रांति, आधार आधारित कल्याणकारी ढांचा, जीएसटी, अनुच्छेद 370 का हटना, राम मंदिर निर्माण, जैसी तमाम उपलब्धियां उनके नाम हैं। उनके कार्यकाल में भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है और विनिर्माण, रक्षा उत्पादन तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज कर चुका है। नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेता हैं, हालांकि कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां अपेक्षाएं अभी अधूरी हैं। रोजगार सृजन, कृषि आय में स्थायी वृद्धि, न्यायिक सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य अवसंरचना और सामाजिक समरसता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभी भी व्यापक काम की आवश्यकता है।

भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अभी लंबी यात्रा बाकी है। यह भी सच है कि लंबा शासनकाल अपने साथ नई चुनौतियां लाता है। सत्ता की निरंतरता जवाबदेही की अपेक्षाएं बढ़ाती है। प्रधानमंत्री के आलोचक संस्थागत संतुलन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहमति के लिए सीमित होती जगह जैसे प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि उपलब्धियों के साथ इन प्रश्नों पर भी विमर्श हो। यह सच है कि इतिहास नेताओं को चुनावी जीतों से नहीं, उनके द्वारा छोड़ी गई स्थायी विरासत से याद रखता है। यदि आने वाले वर्षों में भारत रोजगार, शिक्षा, तकनीकी नवाचार और सामाजिक समावेशन के क्षेत्रों में निर्णायक प्रगति करता है, तो मोदी का कार्यकाल केवल सबसे लंबे निर्वाचित नेतृत्व के साथ परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में भी अवश्य याद किया जाएगा। रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अंततः राष्ट्रों का इतिहास कीर्तिमान नहीं, सार्थक परिणाम लिखते हैं। प्रधानमंत्री के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने लंबे राजनीतिक जनादेश को भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय रूपांतरण में बदलने की है।