फुटपाथ पर पैदल चलने 'मौलिक अधिकार', पिता की याचिका पर SC का ऐतिहासिक फैसला
दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी है कि निर्धारित फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार नागरिकों का मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि पैदल चलने के लिए तय किए गए रास्तों पर मोटर वाहनों के मुकाबले पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हिस्सा
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदूरकर की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत गारंटीकृत आने-जाने की स्वतंत्रता के अधिकार का एक अहम हिस्सा है। इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए), 19(1)(बी), 19(1)(सी) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। पीठ के अनुसार, पैदल चलने के इस अधिकार में निर्धारित फुटपाथ का अधिकार स्वतः ही शामिल होगा।
एक पिता की याचिका और दुर्घटना के मामले पर आया फैसला
सर्वोच्च न्यायालय की यह ऐतिहासिक टिप्पणी मोटर दुर्घटना मुआवजे के एक बेहद भावुक मामले में आई है। एक लाचार पिता ने अपने मात्र पांच साल के मासूम बेटे को स्कूल ले जाते समय एक सड़क हादसे में खो दिया था। उच्च न्यायालय ने इस मामले में मुआवजे की राशि कम कर दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब निरस्त कर दिया है। शीर्ष अदालत ने मृत बच्चे के पिता को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया है और दो महीने के भीतर इसका भुगतान करने का आदेश जारी किया है।
फुटपाथ पर पैदल चलने के मौलिक अधिकार
अदालत ने कहा कि निर्धारित फुटपाथ पर पैदल चलने के मौलिक अधिकार के साथ एक संबंधित जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अगर देश में सड़क है, तो यह सुनिश्चित करने का दायित्व प्रशासन का बनता है कि पैदल चलने वालों के लिए चिह्नित और अच्छी तरह से बनाए गए फुटपाथ हों। कोर्ट ने कहा कि इस कर्तव्य को निभाने की जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और यहाँ तक कि पंचायतों की है।
उन्हें फुटपाथ के निर्माण, रखरखाव और सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करना होगा। यदि निर्धारित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो नागरिक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सुधार एवं मुआवजे के लिए संवैधानिक और कानूनी उपाय अपना सकते हैं। यह उपाय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले उपायों से बिल्कुल अलग होगा। सुप्रीम कोर्ट ने देश में पैदल चलने संबंधी इस मौलिक अधिकार को जमीन पर बेहतर और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक विशेष 'नियामक इकाई' के गठन की भी पुरजोर पैरवी की है।
