Bahraich News: पयागपुर में बदहाल बचपन की तस्वीर, किताबों की जगह कूड़े का बोरा उठा रहे मासूम व्यवस्था पर सवाल
बहराइच के पयागपुर नगर क्षेत्र में मासूम बच्चे कूड़ा बीनकर जीवन गुजारने को मजबूर हैं। शिक्षा और बाल श्रम उन्मूलन के दावों के बीच जमीनी हकीकत ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमृत विचार, बहराइच। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, कॉपियां और खिलौने होने चाहिए, उसी उम्र में पयागपुर नगर क्षेत्र के कई नौनिहाल कूड़े के ढेर में अपना बचपन तलाशने को मजबूर हैं। गरीबी और बदहाली की वजह से ये बच्चे स्कूल जाने की बजाय गलियों और बाजारों में कचरा बीनते नजर आ रहे हैं। शासन की ओर से ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’, मुफ्त शिक्षा और बाल श्रम उन्मूलन को लेकर तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन पयागपुर की सड़कों पर दिख रही यह तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
सुबह होते ही शुरू हो जाता है कचरा बीनने का सिलसिला
जहां समर्थ परिवारों के बच्चे सुबह स्कूल जाने की तैयारी करते हैं, वहीं आर्थिक तंगी से जूझ रहे ये मासूम बच्चे हाथ में बोरा लेकर गलियों, नालियों और बाजारों में निकल पड़ते हैं। पयागपुर के मुख्य बाजार, रेलवे स्टेशन रोड और आसपास की गलियों में ये बच्चे दुकानों के बाहर पड़े कचरे से प्लास्टिक की बोतलें, गत्ते और अन्य सामान चुनते दिखाई देते हैं। नंगे पैर या टूटी चप्पलों में कचरा बीनते इन बच्चों की आंखों में पढ़ाई और खेल के सपनों की जगह दो वक्त की रोटी की चिंता नजर आती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर संकट
कचरे के ढेर के बीच काम करने वाले इन बच्चों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। कांच के टुकड़ों, गंदगी और जहरीले कचरे के संपर्क में रहने से इनके बीमार होने की आशंका बनी रहती है। वहीं, शिक्षा के अधिकार के बावजूद ये बच्चे स्कूलों से दूर हैं। ऐसे में बाल अधिकार संरक्षण और मुफ्त शिक्षा योजनाओं की जमीनी स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रशासनिक दावों पर उठे सवाल
नगर पंचायत क्षेत्र में विकास और समाज कल्याण को लेकर तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन इन बच्चों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचता दिखाई नहीं दे रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग, बाल विकास विभाग और प्रशासन को ऐसे बच्चों को चिह्नित कर उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
बचपन को चाहिए किताबें, कूड़े का बोरा नहीं
यह तस्वीर सिर्फ प्रशासन ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। जरूरत है कि सामाजिक संस्थाएं और जिम्मेदार विभाग आगे आकर इन बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए प्रयास करें। इन नन्हें हाथों से कूड़े का बोरा हटाकर अगर कलम थमा दी जाए, तो यही बच्चे देश के भविष्य की मजबूत नींव बन सकते हैं।
