घाघरा के सैलाब में साथ दिखे मंदिर-मस्जिद और दो बुजुर्ग, बोली बाराबंकी की मिट्टी- ‘नफरत से बड़ी है मोहब्बत’
बाराबंकी, अमृत विचार। देवा और महादेवा की पावन धरती पर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसालें अक्सर देखने को मिलती हैं। देवा मजार पर होली खेलने की सदियों पुरानी परंपरा इसी सांझी संस्कृति की पहचान है। अब घाघरा (सरयू) की बाढ़ के बीच रामनगर तहसील के हेतमापुर गांव से सामने आई एक तस्वीर ने फिर साबित कर दिया कि सैलाब तबाही ला सकता है, लेकिन इंसानों के दिलों में बसा भाईचारा नहीं बहा सकता।

बाढ़ का जायजा लेने के दौरान गांव की सीमा पर स्थित एक प्राचीन मंदिर और उसके ठीक पास बनी मस्जिद के आसपास का नजारा हर किसी को ठहरकर देखने पर मजबूर कर रहा था। करीब 75 वर्षीय हिंदू बुजुर्ग सुकई और लगभग 100 वर्षीय मौलाना आशिक अली एक-दूसरे का हाथ थामे गांव की ओर लौट रहे थे। चारों ओर घाघरा का पानी था, लेकिन दोनों बुजुर्गों के चेहरों पर सुकून और कदमों में अपनापन दिखाई दे रहा था।
ग्रामीणों के बीच मान्यता है कि जब घाघरा का पानी मंदिर और मस्जिद के करीब पहुंचता है, तभी बाढ़ का प्रकोप कम होकर पानी वापस लौटना शुरू करता है। इसी दौरान सुकई ने बेहद सहज अंदाज में कहा कि बाढ़ हर साल आती है, गांव में मंदिर भी है और पास में मस्जिद भी। हिंदू-मुसलमान सभी मिल-जुलकर रहते हैं और एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। दिल में किसी के लिए कोई मैल या भेदभाव नहीं है। वहीं करीब सौ वर्ष की उम्र में भी गांव की मस्जिद में अजान देने वाले मौलाना आशिक अली ने कहा, “हमारे गांव में हिंदू और मुसलमान होने का कोई फर्क ही नहीं है। हम सब एक परिवार की तरह रहते हैं। अभी हम दोनों साथ ही बाहर गए थे और अब साथ गांव लौट रहे हैं।”
घाघरा का पानी खेतों और रास्तों को डुबो रहा है, लेकिन हेतमापुर में मंदिर और मस्जिद के बीच खड़े ये दो बुजुर्ग एक ऐसी तस्वीर छोड़ गए, जिसमें मजहब से ऊपर इंसानियत नजर आई। सुकई और मौलाना आशिक अली का साथ मानो यह संदेश दे रहा था कि बाढ़ का पानी गांवों को घेर सकता है, लेकिन आपसी प्रेम, विश्वास और भाईचारे की जड़ों को नहीं उखाड़ सकता। बाराबंकी की इस तस्वीर में देवा-महादेवा की उसी गंगा-जमुनी तहजीब की झलक दिखाई दी, जिसकी खुशबू सदियों से इस मिट्टी में रची-बसी है।
