आर्ट गैलरी : रोजमर्रा की चीजों में कला की नई दृष्टि

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Edited By Anjali Singh
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सुबोध गुप्ता की चर्चित कलाकृतियों में ‘वेरी हंग्री गॉड’ अपनी विशालता और प्रतीकात्मकता के कारण विशेष आकर्षण पैदा करती है। पहली नजर में यह रसोई में इस्तेमाल होने वाले स्टील के बर्तनों और उपकरणों से निर्मित एक विशाल खोपड़ी दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे छिपा अर्थ कहीं अधिक गहरा है। गुप्ता ने रोजमर्रा की वस्तुओं को कलात्मक रूप देकर मनुष्य की उपभोग की प्रवृत्ति, भौतिक इच्छाओं और जीवन-मृत्यु के संबंध को सामने रखा है।

खोपड़ी, जो सामान्यतः मृत्यु का प्रतीक मानी जाती है, जब चमकते बर्तनों से आकार लेती है, तो यह जीवन और उपभोग के बीच एक दिलचस्प विरोधाभास पैदा करती है। भोजन, भूख और घरेलू जीवन से जुड़ी वस्तुएं यहां अस्तित्व और मृत्यु जैसे गंभीर प्रश्नों से जुड़ जाती हैं। ‘वेरी हंग्री गॉड’ इसी वजह से केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि आधुनिक समाज और उसकी बढ़ती भौतिक आकांक्षाओं पर विचार करने का माध्यम बन जाती है।

चित्रकार के बारे में

भारतीय समकालीन कला को वैश्विक मंच पर विशिष्ट पहचान दिलाने वाले कलाकारों में सुबोध गुप्ता का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1964 में जन्मे गुप्ता ने कला की पारंपरिक परिभाषाओं को विस्तार देते हुए ऐसी वस्तुओं को अपनी रचनात्मकता का माध्यम बनाया, जिन्हें हम आम जिंदगी में सहजता से इस्तेमाल करते हैं। स्टील के बर्तन, टिफिन, बाल्टियां और रसोई से जुड़ी दूसरी वस्तुएं उनके लिए महज घरेलू सामान नहीं, बल्कि समाज को समझने और उस पर सवाल उठाने का जरिया हैं।

उनकी कला में भारत के बदलते सामाजिक परिवेश, तेजी से बढ़ते वैश्वीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति की झलक दिखाई देती है। गुप्ता साधारण वस्तुओं को नए संदर्भ में प्रस्तुत करके दर्शकों को संस्कृति, पहचान, परंपरा और आधुनिकता के रिश्ते पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। यही अनोखी कलादृष्टि उन्हें समकालीन भारतीय कला का महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हस्ताक्षर बनाती है।