मॉय फर्स्ट राइड : स्टेयरिंग थामने का रोमांच
कार चलाना सीखने का मेरा पहला दिन आज भी जेहन में बिल्कुल ताजा है। कार की ड्राइविंग सीट पर बैठते समय मन में उत्साह से ज्यादा घबराहट थी। अब तक कार में बैठकर सड़कों पर सफर तो खूब किया था, लेकिन उस दिन पहली बार स्टेयरिंग मेरे हाथों में था। प्रशिक्षक ने कार स्टार्ट करने के लिए कहा। मैंने क्लच दबाया, गियर लगाया और धीरे-धीरे एक्सीलेटर दबाया।
जैसे ही कार आगे बढ़ी, दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई। ऐसा लग रहा था मानो कार नहीं, बल्कि मेरा आत्मविश्वास आगे बढ़ रहा हो। शुरुआत में स्टेयरिंग संभालने और क्लच-एक्सीलेटर का तालमेल बैठाने में काफी परेशानी हुई। कई बार कार झटके से बंद हो गई और हर बार मुझे अपनी गलती पर हंसी भी आई और थोड़ी झेंप भी हुई।
पहले दिन सड़क पर दूसरे वाहनों को देखकर डर लगता था। मोड़ आते ही हाथ-पैर थोड़े सुस्त पड़ जाते। प्रशिक्षक बार-बार समझाते कि घबराने के बजाय सड़क पर ध्यान रखो और हर काम आराम से करो। उनकी बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी। कुछ दिनों के अभ्यास के बाद गियर बदलना, ब्रेक लगाना और मोड़ लेना सहज लगने लगा।
फिर वह दिन भी आया जब मैंने पहली बार बिना किसी मदद के कार सड़क पर चलाई। उस पल भीतर एक अलग ही खुशी थी। उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कोई भी नई चीज पहली बार कठिन लगती है। डर स्वाभाविक है, लेकिन निरंतर अभ्यास और धैर्य के साथ वही डर आत्मविश्वास में बदल जाता है।
आज भी कार की स्टेयरिंग थामते समय मुझे अपने उस पहले दिन की याद जरूर आती है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि कार चलाना सीखना केवल ड्राइविंग सीखना नहीं था। इस अनुभव ने मुझे धैर्य, एकाग्रता और अपनी गलतियों से सीखने का महत्व भी समझाया। पहली बार स्टेयरिंग थामने का वह डर आज एक खूबसूरत स्मृति बन चुका है।
-डॉ. जफर सैफी, चिकित्सा अधिकारी, शाहजहांपुर
