बरेली: नई पीढ़ी को इस बार पहाड़ी संस्कृति से परिचित नहीं करवा सकेगा उत्तरायणी मेला, ये रहीं मेले की विशेषताएं
अमृत विचार, बरेली। उत्तराखंड की संस्कृति से नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिए शुरू हुए उत्तरायणी मेले का इस बार आयोजन नहीं होगा। यह एक दिवसीय मेला बरेली जनपद में व्यापक रूप ले चुका है। इस मेले का पूरे साल न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि बरेली वासियों को भी इंतजार रहता है। परंपरा को निर्बाध …
अमृत विचार, बरेली। उत्तराखंड की संस्कृति से नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिए शुरू हुए उत्तरायणी मेले का इस बार आयोजन नहीं होगा। यह एक दिवसीय मेला बरेली जनपद में व्यापक रूप ले चुका है। इस मेले का पूरे साल न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि बरेली वासियों को भी इंतजार रहता है।
परंपरा को निर्बाध बनाए रखने के लिए इस बार उत्तरायणी जनकल्याण समिति नेहरू युवा केंद्र पर खिचड़ी वितरण का आयोजन कर रही है। इसमें उत्तरायणी पर्व का विशेष पकवान घुघुतिया भी बनाया जाएगा। उत्तरायणी जन कल्याण समिति के फाउंडर मेंबर और वर्तमान अध्यक्ष पीसी पाठक बताते हैं कि वर्ष 1993 से पूर्व बरेली जिले में उत्तराखंड मूल के बरेली निवासियों ने अनेक सांस्कृतिक संस्थाएं गठित कर रखी थीं।
इसका मूल उद्देश्य उत्तराखंड की संस्कृति से नई पीढ़ी को परिचित कराने का था। इसी उदेश्य के लिए अनेक स्थानों पर रामलीला आदि का मंचन किया जाता था। वर्ष 1992 में सभी संस्थाओं का एक मंच बनाने के लिए उत्तरायणी मेला आयोजित करने का निर्णय लिया गया। वर्ष 1993 में उत्तराखंड शोध संस्थान की अगुवाई में पहला मेला संजय कम्युनिटी हॉल में आयोजित हुआ। इसके लिए उत्तरायणी मेला समिति का गठन हुआ।
इस पहले मेले के अध्यक्ष डा. पीसी संगवाल, संयोजक अरविंद बेलवाल और कोषाध्यक्ष प्रताप सिंह गोरा थे। उप समिति में प्रबंध समिति के संयोजक यूडी वेला और डीडी बेलवाल (जो वर्तमान में मुख्य संरक्षक हैं) थे। सांस्कृतिक समिति के संयोजक स्व. प्रकाश जोशी और स्वागत समिति के डा. एमसी पांडेय थे। 40 सदस्यीय कार्यकारिणी बनी थी।
इससे जुड़े आनंद सिंह भंडारी, पीसी पाठक, मोहन जोशी, केसी सती (वर्तमान कार्यकारिणी के फाउंडर मेंबर हैं) अभी भी सक्रिय हैं। इस मेले के संकल्प रूप पर्वतीय अंचल की विशेषताओं एवं अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने का उद्देश्य था। इस प्रथम मेले को स्वयं स्व. आरएस टोलिया सचिव उत्तराखंड विकास, स्व. शंभु दत्त बेलवाल और गिर्राज शाह आईपीएस का संरक्षण प्राप्त था।
उत्तरायणी मेले के अवसर पर 50 पन्नों की श्वेत श्याम स्मारिका प्रकाशित हुई थी। स्मारिका संपादक मंडल में स्व. घनानंद बुलेला, डा. पीसी जोशी, खेमानंद शर्मा, डीडी पांडेय और अरविंद बेलवाल शामिल थे। स्मारिका के आवरण पर जागेश्वर मंदिर का चित्रण था।
उत्तराखंड के राज्यपाल से लेकर कई मुख्यमंत्री कर चुके हैं उद्घाटन
पहले उत्तरायणी मेले का उद्घाटन मौजूदा महासचिव राज्यसभा, भारत सरकार नई दिल्ली और तत्कालीन जिलाधिकारी देशदीपक वर्मा ने किया था। इस मेले का उद्घाटन अभी तक उत्तराखंड के अधिकांश मुख्यमंत्री व राज्यपाल अपने कार्यकाल के दौरान कर चुके हैं। इनमें स्व. नारायण दत्त तिवारी, महाराष्ट्र के राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, मानव विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और हरीश रावत प्रमुख रूप से शामिल हैं।
वर्ष 2001 में हुआ था समिति का पंजीकरण
वर्ष 2001 में उत्तरायणी जनकल्याण समिति के नाम से समिति का पंजीकरण हुआ। इस समिति की नियमावली बनाने में गिरीश चंद्र पांडे, मोहनचंद्र जोशी और डीडी बेलवाल ने अहम भूमिका निभाई थी। मेला पहले एक दिन का था फिर दो दिन का किया गया। इसके बाद मोहनचंद्र जोशी और महासचिव के कार्यकाल में तीन दिवसीय होने लगा। मेला निरंतर प्रगति पथ पर चलते हुए व्यापक और भव्य रूप ले चुका है। आर्थिक संसाधन जुटाने में एसएस बिष्ट, देवेंद्र जोशी, वर्तमान महासचिव बीसी पांडेय, भवानी दत्त जोशी, मनोज कांडपाल, गिरीश चंद्र पांडेय, उमेश तिवारी, केसीएस बिष्ट आदि का सहयोग रहा है।
2019 में मनाई रजत जयंती
वर्ष 2019 में उत्तरायणी मेले की रजत जयंती मनाई गई थी। स्मारिका को उत्कृष्ट रूप देने में डा. नवीन उप्रेती, अमित पंत, प्रकाश पाठक का अमूल्य सहयोग रहा है। इस साल कोरोना महामारी के कारण मेले का आयोजन स्थगित किया गया है। सभी पदाधिकारियों को इसका अफसोस है। बरेली जनपद की संस्था को इस मेले के आयोजन का इंतजार रहता है, वह भी निराश है। परंपरा न टूटे इसलिए नेहरू युवा केंद्र में खिचड़ी भोज का आयोजन किया जा रहा है जिसमें उत्तरायणी पर्व का विशेष पकवान घुघुतिया होगा।
