गलत को प्रोत्साहन
राजनीति में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप की भाषा मर्यादा लांंघ चुकी है। वोटरों को बरगलाने के लिए नेता दूसरे दलों पर जिन शब्दों में छींटाकशी कर रहे हैं उसका जनता पर असर भले ही न हो, लेकिन राजनीति की गरिमा जरूर गिरती जा रही है। हालिया मामला आम आदमी पार्टी के विधायक सोमनाथ भारती का है, …
राजनीति में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप की भाषा मर्यादा लांंघ चुकी है। वोटरों को बरगलाने के लिए नेता दूसरे दलों पर जिन शब्दों में छींटाकशी कर रहे हैं उसका जनता पर असर भले ही न हो, लेकिन राजनीति की गरिमा जरूर गिरती जा रही है।
हालिया मामला आम आदमी पार्टी के विधायक सोमनाथ भारती का है, जिन्होंने पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के अस्पतालों को लेकर जो बयान दिया उसका समर्थन बिल्कुल नहीं किया जा सकता। इस बयान में उनकी भाषा न तो संयमित रही और न ही वह स्वीकार करने योग्य है। यही वजह है कि इस बयान के लिए अमेठी पुलिस ने सोमनाथ भारती के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उनको गिरफ्तार किया और कोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज कर उन्हें सोमवार को 14 दिन के लिए जेल भेज दिया।
यहां तक तो अनर्गल बयानबाजी के लिए कानून ने अपना काम किया लेकिन अमेठी दौरे के दौरान गिरफ्तारी से पहले हिंदू युवा वाहिनी के नेता जितेंद्र सिंह ने भारती पर स्याही फेंककर जिस तरह से उनका विरोध किया वह भी उनके बयान जितना ही गैरकानूनी और असंसदीय है, इसलिए आम आदमी पार्टी के विधायक के बयान की निंदा करने वालों को हिंदू युवा वाहिनी के नेता की स्याही फेंकने की हरकत की भी उसी तरह से निंदा करने चाहिए थी लेकिन ऐसा करने के बजाय रायबरेली की हरचंदपुर क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक राकेश सिंह ने ऐसा कृत्य किया है जिसे बिल्कुल भी उचित नहीं कहा जा सकता।
कांग्रेस विधायक ने सोमनाथ भारती पर स्याही फेंकने वाले जितेंद्र सिंह को माला पहनाकर और 51 हजार रुपये देकर सम्मानित किया। ऐसा करके कांग्रेस विधायक भले ही कोई संदेश देना चाहते हों लेकिन गलत को गलत से सही ठकराने के उनके तर्कों से सहमत नहीं हुआ जा सकता।
किसी को गलत ढंग से दंडित करने वाले को सार्वजनिक तौर पर प्रोत्साहित करके आप गलत कृत्य को ही बढ़ावा देते हैं। ऐसा करके हम गलत की निंदा कर पाने लायक कैसे हो जाएंगे? जिस कृत्य को हमें हतोत्साहित करना चाहिए उसे ही बढ़ावा देकर आखिर हम क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं?
राजनीति में असंसदीय बयानबाजी और गलत कृत्यों को प्रोत्साहित करने वालों का भी बहिष्कार किया जाना चाहिए, इसलिए क्योंकि ये जनप्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता से चुनकर आते हैं। उन्हें तो अच्छे कार्यों के उदाहरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, तभी सही मायने में वे जनप्रतिनिधि कहलाने के हकदार हो सकते हैं।
